Insight Facts - Dr. Hari Singh Gour University -Sagar

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हुक्मरानों/सियासतदारों आप हमारे सागर विश्वविद्यालय के संस्थापक गौर बब्बा को भारत रत्न दिलवाने के लिए कुछ न करो, खुद ही स...
07/03/2026

हुक्मरानों/सियासतदारों आप हमारे सागर विश्वविद्यालय के संस्थापक गौर बब्बा को भारत रत्न दिलवाने के लिए कुछ न करो, खुद ही सब ले लो
लेकिन गौर बब्बा ने जो रत्न इस देश को दिए वो अनमोल है ।

ौर_जय_हिंद ।

27/08/2023

सांस्कृतिक परिषद् डॉक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर के तत्वाधान में विश्वविद्यालय के छात्र छात्राओं ने सांस्कृतिक परिषद के समन्वयक डॉ. राकेश सोनी के मार्गदर्शन में ,पारंपरिक बुंदेली वेशभूषा में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र ( इसरो) द्वारा प्रक्षेपित चंद्रयान 3 के सफल प्रक्षेपण तथा चंद्रयान की सफल लैंडिंग हेतु हाथों में राष्ट्रध्वज तिरंगा लहराकर शुभकामनाएँ प्रेषित की।

स्वामी विवेकानंद हॉस्टल का नजारा
30/04/2023

स्वामी विवेकानंद हॉस्टल का नजारा

डां. हरीसिंह गौर यूनिवर्सिटी के राजनीति विज्ञान एवं लोकप्रशासन विभाग के पूर्व व्याख्याता व वर्तमान में बनारस काशी यूनिवर...
03/04/2023

डां. हरीसिंह गौर यूनिवर्सिटी के राजनीति विज्ञान एवं लोकप्रशासन विभाग के पूर्व व्याख्याता व वर्तमान में बनारस काशी यूनिवर्सिटी के राजनीति विज्ञान के आचार्य प्रो.संजय श्रीवास्तव जी ने बिहार सेंट्रल यूनिवर्सिटी के कुलपति का दायित्व ग्रहण किया। सागर यूनिवर्सिटी की ओर से हादिक शुभकामनाएं ।बधाई सर💐💐

"चाय की टपरी पर बात होती हैविकास की अधिकारों की,शिक्षा की,उसी टपरी पर आवाज़ आती है,छोटू:दो चाय लाना..."                  ...
23/03/2023

"चाय की टपरी पर बात होती है
विकास की अधिकारों की,शिक्षा की,
उसी टपरी पर आवाज़ आती है,
छोटू:दो चाय लाना..."
#श्याम_चाचा_जी...सागर विश्वविद्यालय!

05/03/2023
सब कुछ याद रहा, बस जिनके लिए, जिनके नाम से कार्यक्रम था उनका ही ख्याल रखना भूल गए। #इतिहास में दर्ज हुआ  #सागर का गौरव म...
27/11/2022

सब कुछ याद रहा, बस जिनके लिए, जिनके नाम से कार्यक्रम था उनका ही ख्याल रखना भूल गए।

#इतिहास में दर्ज हुआ #सागर का गौरव महोत्सव, करोड़ों खर्च हुए, हजारों की संख्या में बैनर पोस्टर लगे, तीन बत्ती पर अभी तक का सबसे बड़ा मंच भी बना, मुख्यमंत्री आए, मंत्री आए, विधायक आए, 30 मिनिट तक लाखों की आतिशबाजी हुई लेकिन सागर विश्वविद्यालय पर स्थापित गौर मूर्ति पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।जिम्मेदार मूर्ति पर रंग करवाना ही भूल गए या इतना जरूरी ही नही समझा। गौर मूर्ति की स्थिति आपके सामने है।
#बुंदेली_हलचल

 #नोट- वह लोग इस लेख को पूरा जरूर पढ़ें जिन्हें लगता है कि महात्मा गांधी जी ने भगत सिंह जी को बचाने के लिए कोई प्रयास नही...
01/04/2022

#नोट- वह लोग इस लेख को पूरा जरूर पढ़ें जिन्हें लगता है कि महात्मा गांधी जी ने भगत सिंह जी को बचाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया था।
एवं #राष्ट्रीय_स्वयंसेवक_संघ(RSS)के झूठे प्रचार को सच मानते रहे है।
#गांधी_भगतसिंह_का_इतिहास।
गांधी और भगतसिंह इतिहास की कसौटी पर

महात्मा गांधी और भगत सिंह दोनों बहुत बड़े लोग है जिनके बारे में मेरी कुछ भी कहने की कोई हैसियत नहीं है। इन दोनों महापुरुषों के प्रति अगाध श्रद्धा प्रदर्शित करते हुए उनमें से किसी को भी छोटा या बड़ा दिखाने की कोशिश न करते हुए सिर्फ उतनी बात हम देखने की कोशिश करना चाहिए जितनी बात इतिहास में दर्ज है। सहमति असहमति सबकी अपनी जगह है पर दुराग्रह की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। दुराग्रह उसे कहते हैं कि जिसका कोई प्रमाण नहीं होता फिर भी आप उसी बात पर अड़े रहते हैं।

लाहौर की सेंट्रल जेल में फांसी के फंदे पर भगतसिंह सहित जो तीन नौजवान हंसते हंसते झूले और कुछ देर थरथराने के बाद शांत हो गए। कई बार लगता है कि इन तीन लाशों की तुलना में हम करोड़ों लोग कितने बोने हैं। आज पाकिस्तान के लाहौर में सेंट्रल जेल में भगतसिंह नहीं हैं। वहां एक बड़ा सा मॉल बन गया है और एक बड़ी सड़क बन गयी है जिस पर रात दिन गाड़ियां दौड़ती रहती हैं। आज अगर ये तीन सपूत बोल सकते और वे हमसे पूछते कि हम भारत के लिए शहीद हुए या पाकिस्तान के लिए? तो न इस प्रश्न का आपके पास कोई जबाव है न मेरे पास।

इतिहास इन तीन लाशों पर रुका नहीं क्योंकि इतिहास कभी रुकता नहीं है वो तो चलता रहता है। इतिहास लाहौर से चला और सही 17 साल बाद 30 जनवरी 1948 को दिल्ली के बिड़ला हाउस पहुंच गया। यहां एक 78 साल के बूढ़े आदमी को प्रार्थना के समय जाते हुए सामने से आकर कोई गोलीं मारता है और एक बहुत बड़ा आदमी जिसे हम अपना वटवृक्ष कहते थे, तीन गोलियां खाकर भर भरा कर गिर गया। उसकी भी लाश थोड़े समय तक थरथराती है और शांत हो जाती है। दिल्ली के बिड़ला हाउस में आज गांधी नहीं हैं। वहां गांधी की यादें रह गयी हैं।

शाहिर लुधियानवी से माफी मांगते हुए यह पक्तियां प्रस्तुत हैं-
ये जश्न मुबारक हो फिर भी यह सदाकत है,
हम लोग हकीकत के अहसास से तारी हैं।
गांधी हों या भगतसिंह इतिहास की नजरों में
हम दोनों के कातिल और दोनों के पुजारी हैं।

गांधी और भगत सिंह दोनों भारत की स्वाधीनता के लिए लड़े और अंतिम सांस तक लड़े। भगत सिंह, गांधी के प्रति पूरा सम्मान प्रदर्शित करते हैं। भगत सिंह खुद स्वीकार करते थे कि क्रांति का मतलब बम और पिस्तौल से नहीं है और इस तरह की पटाकेबाजी से क्रान्ति या बदलाव नहीं आ सकता। वे एक गम्भीर व्यक्तित्व वाले नौजवान थे जो चिंतन और विचार विमर्श को अधिक महत्व देते थे। उन्होंने कहा भी कि जब वे महात्मा गांधी के अहिंसक तरीके का विरोध कर रहे है तो इसलिए कर रहे हैं कि उनको लगता है कि महात्मा गांधी एक अत्यंत असंभव आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं और भारतीय समाज अभी अहिंसा के लिए तैयार नहीं है। लेकिन वे गांधी के प्रति पूर्ण सम्मान प्रदर्शित करते हुए कहते है कि महात्मा गांधी ने लोक जागरण का जो महान कार्य किया है उसके लिए उन्हें कोटि कोटि सलाम न किया जाय तो उनके प्रति बहुत बड़ा अन्याय होगा ।

गांधी और भगत सिंह दोनों के ही रास्ते, दोनों के कार्यक्रम, दोनों के संगठन, दोनों के लक्ष्य अलग थे। दोनों ही अपने विचारों से एक इंच भी सरकने को तैयार नहीं थे। फिर भी एक प्रश्न उठता है कि गांधी को भगत सिंह को बचाने की कोशिश करनी चाहिए थी। क्योंकि गांधी राष्ट्रपिता थे। एक पिता बनना ही बहुत कठिन काम है, तो राष्ट्रपिता बनना तो बहुत ही कठिन काम है। करोड़ों करोड़ लोग और उनकी आकांक्षाएं, उनकी अपनी आशा और विश्वास उन सब का बोझ जो ढो सके, उन सबके दिए घावों को जो बर्दाश्त कर सके, जो अपनी जनता के आंसू पोंछ सके वही राष्ट्रपिता बन सकता है। इसलिए गांधी पर यह जिम्मेदारी आती है कि उन्होंने अपने एक बच्चे को बचाने की कोशिश क्यों नहीं की?

महात्मा गांधी इंग्लैंड से बैरिस्टरी पढ़कर आये थे। वे जानते थे कि सारे सबूत भगत सिंह के खिलाफ हैं और अंग्रेज कानून के दायरे में उन्हें फांसी से बचाना मुश्किल है। गांधी यह भी जानते हैं कि वाइसराय इरविन को भी फांसी को रद्द करने के अधिकार नहीं। ब्रिटेन की संसद ही वाइसराय की सिफारिश पर इसे रद्द कर सकती थी। सभी ऐतिहासिक दस्तावेज पब्लिक डोमेन में हैं ,लेकिन सत्य से किसे लेना देना है और कौन इतना पढ़ेगा कि दरअसल गांधी ने भगत सिंह की फांसी को लेकर कितनी बहस वाइसराय से की और फिर वह बात कहाँ जाकर खत्म होती है। अंग्रेज ,गांधी से कहते हैं कि हम सिर्फ इतना कर सकते हैं कि लाहौर कांग्रेस होने तक फांसी न दें।

गांधी वाइसराय से कहते हैं कि देखिये या तो आप भगतसिंह की फांसी को हमेशा के लिए रद्द करें और फांसी रद्द नहीं कर सकते तो फिर मुझे कोई राहत न दें। मैं झेलूंगा जो मुझे झेलना है। लेकिन में आप से कोई घूस नहीं चाहता हूँ। अब आप गांधी की सैद्धांतिक दृणता को देखिए। वे कहते हैं कि मुझे बीच का कोई रास्ता नहीं चाहिए। फांसी का मुझ पर एक प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा लेकिन मैं उसको झेलने के लिए तैयार हूं लेकिन मैं आपसे कोई गुप्त समझौता नहीं करना चाहता।

भगत सिंह को बचाने के लिए 23 मार्च 1931 को वाइसराय को लिखी उस चिट्ठी में गांधीजी ने जनमत का हवाला देते हुए लिखा कि जनमत चाहे सही हो या गलत, सजा में रियायत चाहता है। जब कोई सिद्धांत दांव पर न हो तो लोकमत का मान रखना हमारा कर्तव्य हो जाता है. ...मौत की सजा पर यदि आप यह सोचते हैं कि फैसले में थोड़ी सी भी गुंजाइश है, तो मैं आपसे यह प्रार्थना करूंगा कि इस सजा को आगे और विचार करने के लिए स्थगित कर दें।

जब गांधी कराची कांग्रेस में पहुंचते हैं तो लाल कुर्तीधारी नौजवान भारत सभा के युवकों ने काले कपड़े से बने फूलों की माला गांधीजी को भेंट की. स्वयं गांधीजी ने कहा कि मैं यहां अपना बचाव करने के लिए नहीं बैठा था, इसलिए मैंने आपको विस्तार से यह नहीं बताया कि भगत सिंह और उनके साथियों को बचाने के लिए मैंने क्या-क्या किया? मैं वाइसराय को जिस तरह समझा सकता था, उस तरह से मैंने समझाया. समझाने की जितनी शक्ति मुझमें थी, सब मैंने उन पर आजमा देखी।

आज जब भी चर्चा भगत सिंह की छिडती है तो वह गांधी तक ही जा पहुंचती है? लेकिन जब हम दोनों शख्शियतों को देखते है तो ऐसी चर्चाएं मात्र 23 साल के भगत सिंह की अद्भुत शहादत का गुमान और एक बूढ़े गांधी द्वारा उसे बचाए न जा सकने की शिकायत एक साथ मौजूद रहती है।

आज न तो भगत सिंह हमारे बीच हैं ना गांधी। हम भारतमाता के दोनों सपूतों को नमन करते हैं । आज जब इंटरनेट के युग में सब कुछ पब्लिक डोमेन में है। किसने क्या भूमिका निभाई? भगतसिंह की डायरियों, तत्कालीन पुस्तकों में और अदालतों के अभिलेखों में सभी की भूमिकाएं दर्ज हैं। उन्हें हम चाहकर भी बदल नहीं सकते।

( #नोट-प्रस्तुत लेख में कुछ अंश गांधी शांति प्रतिष्ठान के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री कुमार प्रशांत के भाषण से लिये हैं)

विश्वविद्यालय में शोध छात्र रहे विशाल विक्रम सिंह एवं लॉ विभाग की छात्रा रहीं चेतना शर्मा के कोरोना से दुखद निधन पर विश्...
20/04/2021

विश्वविद्यालय में शोध छात्र रहे विशाल विक्रम सिंह एवं लॉ विभाग की छात्रा रहीं चेतना शर्मा के कोरोना से दुखद निधन पर विश्वविद्यालय परिवार की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि |

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