15/05/2025
****** *झूठ का जाल* ******
जिंदगी, निरंतर बहने वाली सरिता की भांति उस रोज भी बह रही थी जब व्यापक दृष्टिकोण के साथ परिवर्तन की अनंत क्षमता रखने वाले ऋषभ की मुलाकात दिव्या से होती है जो देखने में सीधी सरल शांत स्वभाव की प्रतीत होती है।
ऋषभ इस सरलता को आज के समय में चल रहे "फ्रेंड्स विद बेनिफिट्स" से भिन्न समझता है और भावनात्मक समर्थन एवं प्रेम की आकांक्षा रखते हुए हाथ आगे बढ़ाता है और दिव्या भी लड़के के स्वभाव में वफादारी और कर्मठता से प्रभावित होकर यह प्रस्ताव स्वीकार कर लेती है।
यद्यपि दोनों की पृष्ठभूमि में विभिन्न आयामों पर पर्याप्त भिन्नता होती है दिव्या इसका अनुभव नहीं कर पाती है और उसके लिए यह सामान्य घटना थी लेकिन ऋषभ इस विषय से परिचित था किन्तु दिव्या की सरलता एवं निष्कपटता एक आकर्षण उत्पन्न करती थी जो ऋषभ को बहुत भाती थी।
"प्यार करने वाले रंग रूप नहीं देखते..
जैसे खून पीने वाले ब्लड ग्रुप नहीं देखते.."
उपर्युक्त पंक्ति का अनुसरण करते हुए ऋषभ दिव्या को अपने हृदय की बात बताता है जिस पर दिव्या की सहमति प्राप्त होती है और दोनों में प्रेम की भावना बलवती होती है एकदूसरे से अथाह प्रेम करते है व अभिन्न प्रेमी-प्रेमिका बनते है।
"शब्दों का मैं मौन लिखूँ
या मेरे हो तुम कौन लिखूँ
बस इतना ही तुम्हे लिख पाया हूँ
तुम अवर्णनीय ...तुम अतुलनीय ..जीवन का सच्चा साथ हो तुम 💕"
उन दोनों की नजदीकिया बढ़ती गयी, ऋषभ निस्वार्थ प्रेम की चाह में एक साधारण सी लड़की को अपने हृदय की राजकुमारी बना लेता है और उसको हर छोटी बड़ी खुशी देने का वादा करता है।
दोनों का रिश्ता काफी मजबूत हो चुका था एक-दूसरे के स्वभाव को अच्छे से समझते थे जीवन के आगामी समय के लिये योजनाए बनाते थे जिसमें दिव्या की आकांक्षाओं को प्राथमिकता देना ही ऋषभ की संतुष्टि थी।
ऋषभ व्यापार क्षेत्र से सम्बद्ध था और दिव्या अध्यापिका थी तो किसी बहाने से दोनों के पास मिलने-जुलने का पर्याप्त अवसर मिल जाता था दोनों ने साथ में जीवन की अविस्मरणीय यात्राएं की जो बहुत यादगार और रोमांच से पूर्ण होती थी।
जब प्रेमिका को घर से बाहर नगर में या नगर के बाहर कहीं जाना होता था तो ऋषभ सदैव उपस्थित होता था जैसे प्रेमिका के लिये ही जीवन समर्पित कर दिया हो और जीवन का प्रथम कार्य प्रेमिका के समक्ष उपस्थित होकर उसे प्रेम की अनुभूति प्रदान करना हो....
दोनों के मध्य के सम्बन्ध अब न केवल भावनात्मक जुड़ाव के थे बल्कि एक पति-पत्नी जैसे हो चुके थे उनमें किसी भी प्रकार का परस्पर कोई संकोच न रहा था और उनके मध्य समन्वयता भी अच्छी थी।
ऋषभ संवेदनशील व्यक्ति था और किसी लड़की का भावनात्मक या शारीरिक लाभ प्राप्त करके छोड़ने में यकीन नही रखता था इसलिए इस रिश्ते को दीर्घकाल के लिये संजोना चाहता था
लेकिन अब दिव्या का वास्तविक नज़रिया दृष्टिगोचर होता है "तू नही कोई और सही, कोई और नहीं कोई और सही...." यह बात ऋषभ की भावनाओं को अंतरतम तक घायल कर गयी।
"पत्थर के सनम, तुझे हमने मोहब्बत का खुदा जाना, बड़ी भूल हुई अरे हमने, ये क्या समझा, ये क्या जाना"
यहां से दोनों के मध्य मतभेद प्रारम्भ हो गया, ऋषभ के मन में दिव्या की जो छवि थी "फ्रेंड्स विथ बेनिफिट्स" से अलग वफादार, सरल स्वभाव की शांत लड़की वाली, वह अब एक पत्थर पर गिरे सीसे की भांति टूटकर बिखर गयी।
"निभाना किसको कहते है
वो कुछ ही लोगो को आता है...
बड़ा आसान है कहना
मुझे तुमसे मोहब्बत है.."
दिव्या का मिजाज अस्थिर चेतना से पूर्ण नजर आने लगा परन्तु अब भी वह कभी हमसफऱ बोलती और कुछ दिन बाद पृथक भविष्य की कल्पना कराती यही प्रक्रिया वह वर्षभर से अधिक समय तक दोहराती रही जिससे ऋषभ के मन में अपना वस्तुकरण होना प्रतीत होने लगा और अपने प्रेम व वफादारी तथा समर्पण की हार देखकर अंतर्मन तक टूट गया।
और बिखरी भावनाओं व टूटे जज्बातों के साथ पृथक होने का निर्णय लिया
"जिस दिन तुम्हारा ध्यान मुझसे हटने लगेगा
मैं स्वयं ही तुम्हारे जीवन से विदा लेकर चला जाऊंगा,
क्योंकि प्रेम और महत्ता के लिए
प्रेमिका से ही लड़ना पड़े तो व्यर्थ है।"
अब दोनों के मन में एक-दूसरे के लिये वह लगाव प्रेम न रहा लेकिन इतना आसान होता है क्या अपने प्रेम को भूलकर आगे बढ़ना.....
इस सन्दर्भ में लडके ने प्रयास भी किये सम्बन्धो में सुधार करने के लिये लेकिन निरंतर प्रेमिका द्वारा अवहेलना नजरअंदाजी द्वारा लडके का मन अंदर ही अंदर व्यथित होता रहा और यह कारण बन गया ऐसे रिश्ते से बाहर जाने का जिसमें प्रेम के नाम पर छला गया हो और भावनाओं का उल्लास बनाया गया हो।
"उसने प्रेम को रोमांच का जब घर बनाया तो मैंने....
आँखें पोंछी, दर्द समेटा, दिल उठाया और चलते बने l"
विदित है कि ऐसे लड़के कम ही है संसार में जो किसी लड़की का तन प्राप्त करने के बाद भी अपने प्रेम को कभी कम नही होने देते है और प्रेमिका को भोग की वस्तु न समझकर उसको अपने जीवन की महत्वपूर्ण इकाई मानते है लेकिन उनके हिस्से में आती है वह लड़कियां जो अपने शरीर को वस्तु मानकर सौपती है लड़के को और मन भर जाने पर बिभिन्न तरीको से पृथक होकर तलाशने लगती है एक नया रोमांच।
अतः आप केवल उन्हें चुनो जिनका नजरिया स्थायी हो जिसके लिये व्यक्ति और भावनाओं का महत्त्व हो जो जानता हो प्रेम की परिभाषा और अपने सम्बन्ध को प्राथमिक बनाता हो।
अंततः तुम केवल उन्हें चुनो..
जिनकी कहानी के तुम मुख्य पात्र हो !! 🌻❤️
🖊️ हर्ष तिवारी
❤️🩹