Our Galexy

Our Galexy Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from Our Galexy, College & University, New Delhi, Charlotte, NC.

05/01/2022

इलॉन मस्क. दुनिया के सबसे अमीर इंसानों में से एक. लेकिन ये आदमी कहीं और दुनिया बसाना चाहता है. इलॉन मस्क इस मकसद के साथ जीते हैं कि उन्हें मंगल ग्रह पर एक इंसानी बस्ती बसानी है. इसी काम के लिए मस्क ने 2002 में स्पेसऐक्स नाम की कंपनी शुरू की. स्पेसऐक्स का उद्देश्य है स्पेस ट्रैवल को सस्ता बनाना. और मनुष्यों को मल्टीप्लानेटरी बनाना. मल्टीप्लानेटरी मतलब एक से ज़्यादा ग्रहों पर रहने वाली प्रजाति.
आज इलॉन मस्क के बड्डे पर आइए जानते हैं कि ये मंगल पर एक ‘सेल्फ सस्टेनिंग कॉलोनी’ क्यों बसाना चाहते हैं. ‘सेल्फ सस्टेनिंग कॉलोनी’ यानी एक आत्मनिर्भर इंसानी बस्ती. जो लंबे वक्त तक पृथ्वी पर निर्भर न हो. बिना किसी बाहरी मदद के अपने आप चल सके.
मंगल पर दुनिया क्यों बसाना चाहते हैं मस्क?
जब इलॉन मस्क से ये पूछा जाता है कि आप पृथ्वी को छोड़कर किसी दूसरे ग्रह पर क्यों बसेरा चाहते हैं? तो वो जवाब देते हैं,

हमारे पास दो रास्ते हैं. पहला रास्ता है कि हम हमेशा पृथ्वी पर रहें. और भविष्य में होने वाली किसी विनाशकारी घटना का इंतज़ार करें. हो सकता है न्यूक्लियर वेपन्स के साथ कोई थर्ड वर्ल्ड वॉर हो जाए. या जैसे एक ऐस्टेरॉइड के टकराने के डायनासौर समाप्त हो गए, वैसे ही हम भी खत्म हो जाएं. इस तरह की किसी भी घटना से हमारी प्रजाति का अस्तित्व खतरे में ही रहेगा. दूसरा रास्ता ये है कि हम इस ग्रह से बाहर निकलकर दूसरे ग्रहों पर भी बस्ती बसाएं. इस तरह मनुष्य अपने विनाश को टाल सकेगा.
दूसरा सवाल है कि मंगल ग्रह पर ही क्यों जाना है? कोई और ग्रह क्यों नहीं? इस पर मस्क कहते हैं,

हमारे सौरमंडल में हमारे पास क्या ऑप्शन्स हैं? शुक्र ग्रह यानी वीनस. यहां बहुत ज़्यादा प्रेशर है और ऐसिड की बारिश होती है. मर्करी यानी बुध ग्रह. ये भी सूरज के बहुत पास है. वहां बहुत ही ज़्यादा गर्मी है. वृहस्पति (ज्यूपिटर) और शनि (सैटर्न) के चांदों पर जा सकते हैं. लेकिन वो बहुत दूर हैं. हम अपने पृथ्वी के चांद को भी टार्गेट बना सकते थे. लेकिन ये एक बड़ी बस्ती के हिसाब से बहुत छोटा पड़ जाएगा. और यहां कोई वायुमंडल नहीं है. चांद पर मंगल के मुकाबले संसाधन भी बहुत कम हैं. इसलिए फिलहाल मंगल सबसे अच्छा ऑप्शन है.
मंगल पर क्या माहौल है?
मंगल पृथ्वी के मुकाबले सूरज से दूर है. इसलिए ये बहुत ठंडा है. मंगल पर औसत तापमान -60 डिग्री सेल्सियस होता है. इलॉन मस्क कहते हैं कि ये थोड़ा ठंडा है लेकिन इसे गर्म किया जा सकता है.

मंगल की हवा कैसी है? बहुत ही खराब. मंगल के वातावरण में ज़्यादातर कार्बनडाइऑक्साइड (96 प्रतिशत) है. करीब 2.5 प्रतिशत नाइट्रोजन है. और लगभग 2 प्रतिशत आर्गन. हमारे काम की गैस ऑक्सीजन सिर्फ 0.174 प्रतिशत है.
मंगल को रेड प्लानेट भी कहा जाता है.
मंगल का डायमीटर (व्यास) पृथ्वी से लगभग आधा है. लेकिन ये पृथ्वी के सबसे करीब वाला साइज़ है. बाकी ग्रह या तो पृथ्वी से बहुत छोटे हैं या बहुत बड़े हैं. मंगल पर ग्रैविटी (गुरुत्वाकर्षण) पृथ्वी के मुकाबले लगभग एक तिहाई है. मतलब आप मंगल पर आसानी से लंबी छलांग मार पाएंगे. मंगल और पृथ्वी अपने अक्ष पर लगभग एक ही स्पीड से घूमते हैं. इसलिए मंगल पर एक दिन पृथ्वी के एक दिन से सिर्फ 40 मिनट बड़ा होता है.

मंगल पर बस्ती बसाने के लिए इलॉन मस्क के पास क्या प्लान है?
सितंबर 2016 में इलॉन मस्क ने अपने प्लान और उसके कई तकनीकी पहलुओं के बारे में विस्तार से बताया था
मंगल पर लाखों लोगों का एक शहर बसाना है. क्या दिक्कत है? दिक्कत है पैसे की. इलॉन मस्क ने एक वेन डायग्राम दिखाया. दो गोले हैं. एक गोले में वो लोग हैं, जो मंगल जाना चाहते हैं. दूसरे गोले में वो हैं, जो इसका खर्च उठा सकते हैं. ये दो गोले बहुत दूर हैं, वो इन्हें पास लाना चाहते हैं. मस्क के मुताबिक, एक आदमी का मंगल जाने का उतना ही पइसा लगना चाहिए, जितना अमेरिका में एक घर खरीदने का औसत खर्च है. 2 लाख डॉलर. लगभग 1.5 करोड़ रुपए. ये खर्च इतना कम कैसे होगा? इलॉन मस्क ने इसके लिए चार सूत्र बताए.

1. फुल रीयूज़ेबिलिटी.

रॉकेट और स्पेसशिप जैसी बड़ी चीज़ें जो इस मिशन में काम आएंगी, उन्हें दोबारा इस्तेमाल किया जा सके. आमतौर पर एक स्पेस मिशन में इस्तेमाल होने वाला रॉकेट सिर्फ एक ही बार के लिए होता है. बीते दशक स्पेसऐक्स ने रीयूज़ेबल रॉकेट्स में बहुत तरक्की हासिल की. 2015 में स्पेसऐक्स ने फैल्कन 9 रॉकेट को ऑर्बिटल लॉन्च के बाद दोबारा सही सलामत ज़मीन पर लैंड कराया. इसके कुछ महीने बाद उन्होंने समुद्र में तैनात एक ड्रोनशिप में अपना रॉकेट लैंड कराया. इससे मिशन का खर्च काफी कम हो जाता है. मस्क चाहते हैं कि मिशन की सारी बड़ी चीज़ें रीयूज़ेबल हों.
पृथ्वी की कक्षा में फ्यूल भरना. पहले रॉकेट स्पेसशिप को ले जाकर पृथ्वी की कक्षा में तैनात कर देगा. उसके बाद स्पेसशिप पृथ्वी की परिक्रमा करेगी और रॉकेट नीचे लैंड करने आ जाएगा. फिर इसी रॉकेट के ऊपर एक फ्यूल टैंक लगाया जाएगा. रॉकेट तुरंत इस फ्यूल टैंक को पृथ्वी की कक्षा में परिक्रमा कर रही स्पेसशिप तक ले जाएगा. रॉकेट दोबारा नीचे आ जाएगा. ये टैंकर भी स्पेसशिप में फ्यूल भरने के बाद पृथ्वी पर लौट आएगा.
ऐसा करने से छोटा रॉकेट बनाकर उसमें ज़्यादा सामान और लोग भरे जा सकते हैं. मस्क के मुताबिक, ऐसा करने से मिशन का खर्च करीब पांच गुना कम हो जाएगा.

3. मंगल पर प्रोपेलेंट बनाना.

प्रोपेलेंट यानी वही फ्यूल जिससे रॉकेट उड़ान भरता है. मंगल पर ढंग का शहर बनाने के लिए स्पेसशिप को वापस पृथ्वी पर भेजना होगा. ऐसा नहीं किया तो मंगल स्पेसशिप्स का कबरिस्तान बन जाएगा. और वहां गए लोगों के पास वापस लौटने का ऑप्शन तो होना ही चाहिए. इसके लिए ये ज़रूरी है कि मंगल पर ही प्रोपेलेंट बनाया जाए. मस्क के मुताबिक, ये करने से मिशन का खर्च 5 गुना और कम होगा.
मंगल पर प्रोपेलेंट बनाने के लिए सही माहौल है. मंगल के वायुमंडल में खूब सारी कार्बनडाइऑक्साइड है. और ज़मीन के नीचे से पानी निकाला जा सकता है. यानी CO2 और H2O का जुगाड़ हो गया. इन दोनों की मदद से O2 (ऑक्सीजन) और CH4 (मिथेन) बनाई जा सकती है.
जहां गए हैं, वहीं के संसाधन इस्तेमाल काम में लाने को INSITU रिसोर्स यूटिलाइज़ेशन कहा जाता है.
4. सही प्रोपेलेंट का चुनाव.

रॉकेट फ्यूल के लिए तीन मेन चॉइस हैं. पहला है कैरोसीन. कई रॉकेट्स में बहुत ही रिफाइन्ड कैरोसीन प्रोडक्ट का इस्तेमाल होता है. दूसरा ऑप्शन है हाइड्रोजन फ्यूल. और तीसरा है मीथेन. मस्क के मुताबिक, इन तीनों में से मीथेन आधारित प्रोपेलेंट सबसे सही साबित होगा. और उसे मंगल पर आसानी से बनाया भी जा सकता है.
तो इलॉन मस्क के मुताबिक ये चार बातें ध्यान में रखकर मंगल पर पहुंचने और लौटने का खर्च काफी कम किया जा सकता है.
कब तक हो पाएगा ये सब काम?
अब आप क्रोनोलॉजी समझिए. पहले तो रॉकेट स्पेसशिप को पृथ्वी के ऑर्बिट (कक्षा) में छोड़ेगा. फिर वो रॉकेट दोबारा पृथ्वी पर लैंड करेगा. उसी रॉकेट के ऊपर फ्यूल टैंक रखा जाएगा. रॉकेट इस फ्यूल टैंक को स्पेसशिप के पास लेकर जाएगा. रॉकेट ज़मीन पर वापस लैंड कर जाएगा. फ्यूल टैंक से स्पेसशिप में फ्यूल ट्रांसफर होगा. और फिर वो फ्यूल टैंक भी पृथ्वी पर वापस आ जाएगा. पृथ्वी की कक्षा में ऐसा तीन से पांच बार किया जा सकता है. फिर ये स्पेसशिप मंगल तक जाएगी. मंगल पर प्रोपेलेंट बनाया जाएगा. इस प्रोपेलेंट को स्पेसशिप में दोबारा भरा जाएगा. और ये स्पेसशिप वापस पृथ्वी लौट आएगी.
मस्क के मुताबिक भविष्य में पृथ्वी की कक्षा में एक साथ हज़ारों स्पेसशिप होंगी. ये सभी स्पेसशिप मार्स की तरफ एक साथ जाएंगी. जब मंगल ग्रह अपनी सही पॉज़िशन पर होगा. ये सही पॉज़िशन क्या है?
आत्मनिर्भर मंगल के लिए 2050 तक एक शहर बनाने की बात मस्क ने कही थी.
पृथ्वी और मंगल दोनों अलग-अलग स्पीड से सूर्य की परिक्रमा करते हैं. हर 26 महीने में एक बार ऐसा वक्त आता है जब पृथ्वी से मंगल पर स्पेस मिशन भेजा जा सकता है. इस समय अवधि को लॉन्च विंडो कहते हैं. जब ये लॉन्च विंडो का वक्त नज़दीक आएगा, तभी स्पेसऐक्स का जहाज़ी बेड़ा एक साथ मंगल की ओर निकलेगा.
इलॉन मस्क मंगल पर करीब 10 लाख लोगों का शहर बसाना चाहते हैं. शुरुआत में एक स्पेसशिप 100 लोग और खूब सारा सामान लेकर जाएगी. इस हिसाब से करीब 10,000 बार उड़ान भरनी होगी. इतने सारे लोग पहुंचाने में कितना वक्त लगेगा? मस्क का अनुमान है कि पहले
लॉन्च के बाद करीब 40 से 100 साल लग सकते हैं. स्पेसऐक्स भविष्य में और बड़े स्पेसशिप तैयार करेगी. इनसे एक बार में 100 से भी ज़्यादा लोग और सामान मंगल तक भेजा जा सकेगा.

अभी क्या तैयारी है?
इलॉन मस्क का मार्स रॉकेट एक बार में करीब 550 टन का पेलोड उठा पाएगा. लगभग इसी साइज़ का नासा का सैटर्न V रॉकेट है. ये अबतक बनाया गया सबसे बड़ा रॉकेट सिस्टम है. इसी का इस्तेमाल करके नासा ने चांद पर लोगों को उतारा था. सैटर्न V एक बार में 135 टन का पेलोड उठा पाता है. मस्क अपने इतने ही बड़े रॉकेट से 550 टन उठाने का दावा कर रहे हैं.
स्पेसऐक्स ने अपने रॉकेट के लिए खास तरह का इंजन डिज़ाइन किया है. इसका नाम है राप्टर इंजन. जो रॉकेट स्पेसशिप को पृथ्वी की कक्षा में ले जाएगा उसमें 42 राप्टर इंजन लगे होंगे. और जो स्पेसशिप मंगल तक जाएगी, उसमें नौ राप्टर इंजन होंगे.

मंगल पर ऐसे स्टारशिप लैंड करेगा.
ये बड़े रॉकेट और स्पेसशिप का बहुत आगे का प्लान है. फिलहाल स्पेसऐक्स जिस स्पेसक्राफ्ट को चांद और मंगल पर मिशन के लिए भेज सकता है, उसका नाम है स्टारशिप. साल 2020 में स्टारशिप की कई टेस्ट फ्लाइट हुईं. इनके बाद स्टारशिप की डिज़ाइन में बदलाव किए गए. इसकी कई टेस्ट फ्लाइट होनी और बाकी हैं. यही स्टारशिप आगे चलकर स्पेसऐक्स के पहले मार्स मिशन में काम आएगी
मंगल पहुंचकर क्या करेंगे?
मंगल पर बस्ती का हुलिया क्या होगा? वहां रहेंगे कैसे? इलॉन मस्क ने इसे लेकर बहुत ज़्यादा डीटेल में बात नहीं की है. शुरुआत से वो मंगल को ‘टेराफॉर्म’ करने की बात कह रहे हैं. टेराफॉर्म करने का मतलब है किसी ग्रह का वातावरण बदलकर उसे मनुष्यों के रहने लायक बनाना. इलॉन मस्क की ट्विटर कवर फोटो में आप मंगल को धीरे-धीरे पृथ्वी जैसे ग्रह में तब्दील होता देख सकते हैं. लेकिन ये कैसे होगा?

मस्क कहते हैं मंगल को बस ज़रा सा गर्म करने की ज़रूरत है. ऐसा करने के लिए इलॉन मस्क मंगल के ध्रुवों पर न्यूक्लियर वेपन चलाने जैसी बात कर चुके हैं. आइडिया ये है कि मंगल के ध्रुवों पर न्यूक्लियर हमले से वहां बर्फ में फंसी कार्बनडाइऑक्साइड वातावरण में छूटेगी. ग्रीनहाउस इफैक्ट देखने को मिलेगा. और मंगल ग्रह गर्म हो जाएगा. अपने इस स्टैंड के लिए मस्क को आलोचना का सामना भी करना पड़ा है.
मंगल पर शहर का स्पेसऐक्स का विज़न.
जब मस्क से इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कुछ और बात कही. उन्होंने अपने ट्विटर पर लिखा कि पहले मंगल पर जीवन ग्लास डोम्स के अंदर ही होगा. उसके बाद मंगल को टेराफॉर्म किया जाएगा, जिससे वो पृथ्वी जैसे लाइफ सपोर्ट कर सके.
टाइमलाइन को लेकर इलॉन मस्क हमेशा से बहुत महत्वाकांक्षी रहे हैं. उन्होंने कहा था कि 2022 में पहला स्पेसऐक्स रॉकेट मंगल ग्रह पर जा सकता है. इस रॉकेट में कोई इंसान नहीं होगा, सिर्फ सामान होगा. ये सामान आगे जाने वाले ह्यूमन मिशन्स के लिए मददगार साबित होगा. मस्क ने कहा था कि साल 2050 तक हम मंगल पर एक सेल्फ सस्टेनिंग सिटी देख पाएंगे. ये कब और कैसे होगा, ये हमें भविष्य में ही पता चलेगा.
और भी नई stories पढ़ने ke लिए Our Galexy को फॉलो करें धन्यवाद 🙏

04/07/2022

शोध कर रहे हैं। इस दौरान वैज्ञानिकों ने कई खोजें की हैं जो दुनिया को हैरत में डालती हैं। अब इस बीच नासा के वैज्ञानिकों ने सबसे बड़ी खोज की है। उन्होंने ऐसे ग्रहों का पता लगाया है जो सूर्य की प्रक्रिमा करते हैं। यह ग्रह अरबों किमी की दूरी पर स्थित हैं। सौर मंडल का निर्माण ये ग्रह मिलकर करते हैं।

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने पता लगाया है कि सौर मंडल के बाहर भी कई ग्रह मौजूद हैं। नासा की तरफ से 21 मार्च 2022 तक 65 नए एक्सोप्लैनट्स पता लगाया गया है। नासा ने बताया कि एजेंसी ने इसके साथ ही 30 सालों में 5000 से अधिक बाहरी ग्रहों को खोजा है। नासा एक्सोप्लैनेट आर्काइव में इसकी जानकारी को रखा गया है। इसके बाद यहीं पर एक्सोप्लैनेट्स के बारे में पीयर रिव्यू होता है। कई तरह की जांच की जाती है।

अंतरिक्ष की खोज में नासा के लिए यह एक मील का पत्थर है। नासा ने जिन एक्सोप्लैनेट्स की खोज की है उनमें से कुछ छोटे और पथरीले हैं। इनमें से कुछ धरती, बड़े गैसे के गोले, बृहस्पति और कुछ सूरज की तरह बेहद गर्म हैं। इनमें कुछ धरती से कई गुना बड़े हैं जहां जीवन की संभावना हो सकती है जबकि कुछ बेहद छोटे हैं।

नासा ने जिन 65 नए ग्रहों को रिसर्च के लिए खोजा है उन पर पानी, सूक्ष्मजीव या जीवना की संभावना हो सकती है। नासा की इस खोज को बहुत बड़ी खोज माना जा रहा है।

नासा का कहना है कि यह सिर्फ संख्या नहीं है, बल्कि ये सभी एक नई दुनिया हैं और नए ग्रह हैं। हम लोगों को हर नए ग्रह के बारे में जानकर खुशी होती है, लेकिन हम इन ग्रहों के बारे में कुछ नहीं जानते। इन पर शोध किया जा रहा है।

नासा का कहना है कि 5000 एक्सोप्लैनेट की संरचना और विशेषताएं अलग-अलग तरह की हैं। नासा के वैज्ञानिक का कहना है कि हम जानते हैं कि आकाशगंगा में ग्रहों की संख्या करोड़ों में है। साल 1992 में इनकी खोज शुरू हुई थी

इसकी खोज तब शुरू की गई जब एक नए तारे का पता लगा। इसके साथ एक न्यूट्रॉन स्टार मिला जिसे पल्सर कहा जाता है। यह तेजी से घूमते हैं और तरंगे छोड़ते नजर आते हैं फिर अचानक गायब हो जाते हैं। सेकेंड्स के अंतर पर दिखने वाली रोशनी की गणना करने के बाद ग्रहों की तलाश शुरू हुई थी

नासा ने साल 2018 में द ट्रांजिटिंग एक्सोप्लैनेट सर्वे सैटेलाइट (TESS) को लॉन्च किया था जिसने एक्सोप्लैनेट खोजने में सहायता की। जेम्स वेब स्पेस टेलिस्कोप (JWST) भविष्य में अंतरिक्ष में मौजूद ग्रहों और तारों की खोज करेगा। यह भी पता लगाएगा कि उन पर जीवन संभव है या नहीं।

[ ]

04/14/2021

नमस्कार अविवादन स्वीकार करिए कुमार कृष्णा का ।।
आज से 10 साल बाद अंतरिक्ष में मनुष्य किन महत्वाकांक्षी योजनाओं को अंजाम देने वाला है ?

अंतरिक्ष में हो रही खोज 1960 के दशक के बाद इतनी रोमांचक कभी नहीं रही जितनी आज के समय है.

आज भारत और चीन के बीच 'स्पेस रेस' या अंतरिक्ष की होड़ दिख रही है, वह आने वाले समय में और बढ़ेगी.

अमरीकी एजेंसी नासा ने स्पेस शटल के बाद, हाल ही में ओरियोन का प्रक्षेपण किया जो अंतरिक्ष में यात्रियों को ले जा सकता है.

यूरोप ने पृथ्वी से 51 करोड़ किलोमीटर दूर एक धूमकेतु पर एक अंतरिक्ष यान उतारा है और चीन अगला स्पेस स्टेशन बनाने की तैयारी कर रहा है.

इस बीच, निजी कंपनियां मानव अंतरिक्ष उड़ानों, अंतरिक्ष पर्यटन और यहां तक कि इंसान को मंगल ग्रह पर भेजने के अभियान से अंतरिक्ष के अर्थशास्त्र को बदलने पर आमादा हैं. NASA
अगले कुछ साल में टेनिस कोर्ट के आकार जैसी जेम्स वेब स्पेस टेलिस्कोप भी बनकर तैयार हो जाएगा.
इस तरह, 2020 के बाद अगले 10 साल में क्या हम चांद पर नए अड्डे, मंगल पर मानव बस्तियां और बहुत से अन्य विस्मयकारी ब्रह्मांडीय खोजों की उम्मीद कर सकते हैं.

अंतरिक्ष: में 6 ऐसी बड़ी भविष्यवाणियां जानेंगे
NASAहमने तीन विशेषज्ञों से बात की है, वो हैं - स्कॉट पेस, स्पेस पॉलिसी इंस्टिच्यूट वाशिंगटन के निदेशक ; डेविड बेकर, नासा के पूर्व इंजीनियर, स्पेसफ़्लाइट पत्रिका के संपादक ; मोनिका ग्रेडी, प्रोफेसर, प्लैनेटरी एंड स्पेस साइंसेज, यूके ओपन यूनिवर्सिटी.

1. फिर चांद पर जाएँगे
डेविड बेकर: चांद पर हम सिर्फ़ तीन दिन में पहुंच सकते हैं और वहां पर अंतरिक्ष यात्रियों को अपेक्षाकृत कम समय के लिए भेजने के लिए बस थोड़े से ही प्रयास की ज़रूरत है. चीन चांद को अपना लक्ष्य बना रहा है और वहां पर अपने अंतरिक्ष यात्रियों को भेजना चाहता है.

मोनिका ग्रेडी: मैं चांद पर अर्ध-स्थाई आवास की परिकल्पना करती हूं. पर यह बस्ती बसाने जैसा नहीं है; इसका इस्तेमाल चांद पर जाने और वहां से मंगल पर रॉकेट भेजने के लिए हो – सौर प्रणाली की आगे और खोज के लिए चांद को आधार बनाया जा सकता है.
स्कॉट पेस: अमरीकी अंतरिक्ष नीति के साथ मुश्किल यह है कि इसने न केवल चांद से हाथ झाड़ लिया, बल्कि इसके बदले मंगल और एस्टिरॉयड्स पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहा है. इस कारण से अंतरिक्ष कार्यक्रम में उसके कई साझेदार कन्नी काट गए हैं क्योंकि उनकी दिलचस्पी चांद में थी.

ये एजेंडे में शामिल होना चाहिेए क्योंकि अमरीका और उसके बड़े साझेदारों के भू-राजनीतिक, तकनीकी और आर्थिक हित इससे जुड़े हुए हैं.

2. मंगल पर अभी क्यों नहीं
मोनिका ग्रेडी: हालाँकि मंगल मानवीय खोज का लक्ष्य है, लेकिन एक बार वहाँ पहुंचने और अपना झंडा गाड़ देने के बाद मुझे नहीं पता कि हम क्या करेंगे. इस बारे में बातचीत हो रही है कि क्या मंगल को उसी तरह इंसान का निवास स्थान बनाया जाना चाहिए, जैसा कि हमने धरती को बनाया है.
स्कॉट पेस: जब हमने कहा कि हम मंगल पर जा रहे हैं, तो हमारी बहुत सी सहयोगी अंतरिक्ष एजेंसियों ने कहा, “मंगल पर जाना तो ठीक है पर यह इतना बड़ा आयोजन है कि हम इसका संचालन नहीं कर सकते. रणनीतिक रूप से हमने एक ऐसा रास्ता चुना जिसमें आज की दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण चीज़ अंतरराष्ट्रीय साझेदारी ही हमसे छूट गई.”
डेविड बेकर कहते हैं: इस बात को मानना पड़ेगा कि नासा के इतिहास में इससे पहले कभी ऐसा नहीं हुआ कि उस पर जनसंपर्क विभाग के उन कुछ लोगों का नियंत्रण हो जो व्हाइट हाउस के इशारे पर चलते हैं. नासा से लोगों को जो दृश्य दिखाया जा रहा है वह उस एजेंसी की क्षमता से बहुत अलग है.
नया ओरियोन अंतरिक्ष भी अंतरिक्ष में केवल तीन सप्ताह तक ही ऑटोनोमस (स्व-संचालन) काम के लिए सक्षम है. मंगल पर जाते हुए भी यह रास्ते में मानव बस्ती बसाए, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती है. मंगल पर जाना मुश्किल, ख़तरनाक और फ़िलहाल समयपूर्व है.
3. चीन और भारत की रेस
डेविड बेकर कहते है: भारत और चीन के बीच अंतरिक्ष की होड़ दिखने लगी है और आने वाले समय में और बढ़ेगी.
स्कॉट पेस कहते है: मैं नहीं समझता हूं कि उस अर्थ में यह होड़ जैसा है. चीन के लिए यह राष्ट्रीय गौरव और कम्युनिस्ट पार्टी के समर्थन, औद्योगिक गुणवत्ता में सुधार करने और युवाओं को विज्ञान और तकनीक की ओर आकर्षित करने का ज़रिया है.
डेविड बेकर कहते है: पश्चिमी देशों में हर नए प्रेसिडेंट या नई सरकार के सत्ता में आने पर नई अंतरिक्ष नीति घोषित होती है. इसमें आमतौर पर निरंतरता की कमी होती है और समय और धन की बर्बादी होती है. इस दृष्टि से चीन लाभ की स्थिति में है– उसकी राजनीतिक व्यवस्था ग़ैर-लोकतांत्रिक है, जिससे वह आने वाले कई वर्षों के लिए अग्रिम योजना बना सकता है और उनको पूरा करने की दिशा में काम कर सकता है.
4. अंतरिक्ष स्पेस स्टेशन का भविष्य
स्कॉट पेस कहते हैं: अमरीका 2024 तक आईएसएस से जुड़ा रहने के लिए प्रतिबद्ध है, पर समस्या यह है कि हमारे (अमरीका के) साझेदार उस समय तक वहां रहेंगे कि नहीं. यह रूस के साथ भविष्य पर भी निर्भर करता है.
NASA
रूस और अमरीका दोनों ही आईएसएस से जुड़े हैं, और दोनों देशों की आपसी निर्भरता बहुत गहरी है. आपसी सम्बन्धों की कटुता से इसे बचाने के भी प्रयास हो रहे हैं.

डेविड बेकरकहते है: रूसी अकेले आईएसएस को नहीं चला सकते क्योंकि यह उनका नहीं है. मुझे लगता है कि इस पूरी चीज़ को “डिऑर्बिट” करना होगा. 2020 तक इसको स्थापिक किए और इसके उपकरणों को शुरू किए हुए 20 साल से अधिक हो जाएंगें.

स्कॉट पेस का कहना है: अंतरिक्ष स्टेशन का भविष्य अंतरराष्ट्रीय साझेदारी के भविष्य पर निर्भर करता है. और अगर हम इस बारे में स्पष्ट रूप से नहीं जानते कि अंतरिक्ष स्टेशन के बाद आगे हम क्या करना चाहते हैं, तो सच तो ये है कि हमें इस अंतरराष्ट्रीय साझेदारी को बंद करना पड़ेगा. इंसान की अंतरिक्ष यात्रा तो निश्चित रूप से जारी रहेगी पर यह पश्चिमी देशों के नेतृत्व में नहीं होगी. 2020 के दशक के मध्य तक चीन का स्टेशन भी आईएसएस पर होगा. यूरोप चीन से चर्चा कर रहा है कि एक चीनी एस्ट्रोनॉट भी आईएसएस पर हो.
5. प्राइवेट कंपनियां एजेंसियों से आगे क्यो है आखिर इस पर
डेविड बेकर कहते है: मुझे लगता है कि एक्ससीओआर और वर्जिन गैलेक्टिक कंपनियां लोगों को अंतरिक्ष में ले जाएँगी. आप अंतरिक्ष की सैर कर सकेंगे पर अधिक संभावना वैज्ञानिकों और प्रयोगों को ‘सब-ऑर्बिटल’ फ्लाइट्स पर ले जाने की होगी।
मोनिका ग्रेडी कहती है:पहली बात तो यह कि अंतरिक्ष में अमीर और तकनीकी में दिलचस्पी रखने वाले ही जा पाएंगे. जब विमानों की उड़नें शुरू हुई थीं, तो सिर्फ़ धनी लोग ही इसमें यात्रा कर पाते थे. चांद पर जाने वाले रॉकेट की उड़ान के साथ भी यही बात है. इस समय तो स्पेस एजेंसियां अंतरिक्ष की परियोजनाओं को अंजाम देती हैं, लेकिन बाद में काम स्पेसएक्स, वर्जिन गैलेक्टिक जैसी कंपनियाँ ही करेंगी.

स्कॉट पेस का कहना है कि : अमरीकी सरकार का आईएसएस को आगे ले जाने के लिए योजना नहीं बनाना, उभरते व्यवसायिक अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए काफी ख़तरनाक़ है. बिना किसी सरकारी मदद के ये अपने बूते पर कैसे बनी रह पाएंगी, यह कहना मुश्किल है.

6. साहसिक लोग जाते रहेंगे

स्कॉट पेस कहते है: इंसान क्या है इसकी परिभाषा के लिए ऐसे कई सवालों का जवाब देना पड़ता है: हम कहां जा सकते हैं? हम क्या देख सकते हैं? हम क्या सीख सकते हैं और वहां से क्या ला सकते हैं? रोबोटिक सिस्टम के साथ साझेदारी में हम जितना संभव हो, उतनी जगहों पर जाना पसंद करेंगे.

मोनिका ग्रेडी कहती हैं : बेशक, रोबोट वो सब कर सकेगा जो इंसान कर सकता है. वैज्ञानिक और तकनीकी उद्देश्यों के लिए इंसानों को भेजने की ज़रूरत नहीं होगी. पर एक उत्सुकता होती है – कौन लोग, क्या करेंगे और क्या खोजेंगे, उम्मीद और प्रेरणा की बात होती है. एक बार जब रोबोट हमें यह बता दे कि यह काम कैसे किया जाता है, लोग वहां जाएंगे.
डेविड बेकर का कहना है कि : मुझे लगता है कि ये बड़ी परियोजनाएं तो होंगी ही- मैं इन्हें साकार होते हुए देखना चाहूँगा. यह बाजार से और लोगों से निर्देशित होगा. हम अंतरिक्ष कार्यक्रमों का लोकतंत्रीकरण होते हुए देखने जा रहे हैं
पेज को follow जरूर करे और ढेर सारी जानकारी के लिए धन्यवाद।

09/27/2020

अगर आप जोखिम भरे सैर-सपाटे के शौक़ीन हैं तो मंगल ग्रह आपके लिए एक बेहतरीन जगह है. धरती से क़रीब साढ़े पांच करोड़ किलोमीटर दूर मंगल ग्रह में वो कशिश है जो शायद ही किसी और जगह में हो.

हज़ारों सालों से इंसान मंगल ग्रह के ख़्वाब देखता रहा है. पहले की सभ्यताएं भी इस ग्रह के बारे में अटकलें लगाती रहीं हैं. पर अब शायद मंगल तक जाने का ख़्वाब पूरा हो जाए.

मंगल की सैर, आख़िर कैसे?

कारोबारी एलन मस्क ने अपनी कंपनी स्पेसएक्स के ज़रिए लोगों को 2022 तक मंगल ग्रह की सैर पर ले जाने का ख़्वाब दिखाया है. इसके लिए पहले यात्रियों को ख़ास ट्रेनिंग दिए जाने की बात कही गई है.
अब अगर इसके लिए आपकी जेब में 10 अरब डॉलर नहीं हुए, तो निराश होने की ज़रूरत नहीं. अमरीकी स्पेस एजेंसी नासा, वर्चुअल दुनिया के ज़रिए आपको मंगल की सैर पर ले जाने की कोशिश कर रही है.
अब आप किसी भी तरह से मंगल पर पहुंचने में कामयाब रहे, तो यहां आपको बहुत सी नायाब जगहें और चीज़ें देखने को मिलेंगी.

मंगल ग्रह पर देखने लायक़ जगहें

यहां धूल के पहाड़ हैं, रेगिस्तान हैं, ज्वालामुखी हैं और गहरे गड्ढे हैं. यहां पूरे ग्रह पर धूल की ऐसी परत है, जैसे आपके चेहरे पर पाउडर पुत गया हो. यहां बारिश नहीं होती. लिहाज़ा मंगल पर एक नया ही मंज़र देखने को मिलेगा.

मंगल ग्रह से हमारी धरती एक बिंदु की मानिंद नज़र आती है. सूरज डूबने का जो मंज़र यहां देखने को मिलता है, वो शायद ही कहीं और देखने को मिले. सूर्य अस्त होने पर यहां आसमान पर लाली नहीं छाती बल्कि पूरा आसमान गहरा नीला हो जाता है.

हालांकि यहां आक्सीजन की कमी है. लेकिन यहां बर्फ़ीली झीलों पर आपको स्कीइंग करने पर यक़ीनन बहुत मज़ा आएगा.

मंगल ग्रह पर जो देखने लायक़ चीज़ें हैं. उनमें नंबर एक पर है, ओलिंपस मॉन्स. ये एक ज्वालामुखी है, जो 22 किलोमीटर ऊंचा है. ये हमारे सौर मंडल का सबसे बड़ा ज्वालामुखी है. ये अभी सुप्त है या सक्रिय, ये तो नहीं पता. लेकिन जब ये सक्रिय रहा होगा, तो आसमान में तोप के गोले जैसी लपटें फेंकता रहा होगा.
मंगल पर जो दूसरी सबसे दिलचस्प चीज़ देखने लायक़ है, वो है वैल्स मैरीनेरिंस. मंगल की भूमध्य रेखा पर करीब चार हज़ार किलोमीटर लंबी ये घाटी कैसे बनी ये भी एक रहस्य है. वैज्ञानिक अभी इस बारे में अटकलें ही लगा रहे हैं.

मंगल ग्रह का वातावरण धरती की तुलना में बेहद कमज़ोर है. धरती से आसमान नीला इसलिए नज़र आता है क्योंकि यहां हवा में बुहत छोटे-छोटे कण होते हैं, जिसकी वजह से जब वातावरण से रोशनी गुज़रती है तो उसका रंग बदल जाता है. लेकिन मंगल ग्रह पर आसमान दिन में पीला सा नज़र आता है. और जब सूरज डूबने लगता है तो वायुमंडल की कमी की वजह से इसकी रौशनी नीली नज़र आने लगती है.

इसके अलावा मंगल पर खनिजों के टीले हैं, जो नीले, हरे और लाल रंग के हैं. ऐसे में जब सूरज की नीली रौशनी इसकी सतह पर पड़ती है तो बेहद दिलकश नज़ारा देखने को मिल सकता है.
मंगल ग्रह पर औसतन तापमान शून्य से 56 डिग्री सेल्सियस नीचे रहता है. लेकिन अगर मंगल के भूमध्य रेखा पर आप रुकेंगे तो यहां का तापमान 35 डिग्री सेल्सियस मिलेगा.
हल्की-हल्की हवा यहां हमेशा चलती रहती है. रात में थोड़ा कोहरा रहता है. लेकिन वायुमंडल की कमी और कार्बन डाई ऑक्साइड की बहुतायत की वजह ये माहौल काफ़ी सर्द होता है. रात में तो तापमान यहां शून्य से 73 डिग्री सेल्सियस नीचे तक गिर जाता है.
मंगल ग्रह पर क़रीब आधे साल बर्फ जमा रहती है. ग्रह के दक्षिणी हिस्से में ये बर्फ कई मीटर ऊंची परत में तब्दील हो जाती है. जो कि कार्बन डाई ऑक्साइड के जमने से बनती है. ऐसे में यहां स्कीइंग करने का अपना अलग ही मज़ा मिल सकता है. हर साल सर्दी के मौसम में यहां बड़ी मात्रा में बर्फ़ जमा हो जाती है. और जब मौसम बदलता है सूरज की रोशनी पड़ती है तो ये बर्फ़ पिघलने लगती है और गैस में बदलने लगती है
ज़मीन पर जिंदगी इसीलिए वजूद में आ सकी, क्योंकि यहां ज़िंदगी के वजूद के लिए पानी जैसी बुनियादी चीज़ मौजूद है.
अगर मंगल पर भी पानी का वजूद हो तो ज़िंदगी का तसव्वुर यहां भी किया जा सकता है. दशकों से वैज्ञानिक इस दिशा में काम कर रहे हैं. लेकिन 2011 में उम्मीद कि एक किरण जगी जब वैज्ञानिकों को यहां पानी के सबूत मिले. इसके बाद से ही वैज्ञानिक, मंगल पर ज़िंदगी की उम्मीदें तलाशने में जुटे हैं. उन्हें लगता है कि मंगल पर किसी गड्ढे में, या फिर सतह के अंदर, ज़िंदगी हो सकती है.
उसका पता तो जब लगेगा, तब लगेगा. तब तक अगर 2022 में आपको मौक़ा मिले और जेब गवाही दे तो एक सैर मंगल की करके आ सकते हैं.

05/31/2020

एलन मस्क की स्पेसएक्स कंपनी द्वारा निर्मित रॉकेट यान ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र (आईएसएस) की तरफ बढ़ रहे नासा के दो अंतरिक्ष यात्रियों को फ्लोरिडा से शनिवार को सफलतापूर्वक कक्षा में भेजा गया.
कोरोना वायरस के बीच अमेरिका की Space x कंपनी ने रचा इतिहास
एलन मस्क की स्पेसएक्स कंपनी द्वारा निर्मित रॉकेट यान ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र (आईएसएस) की तरफ बढ़ रहे नासा के दो अंतरिक्ष यात्रियों को फ्लोरिडा से शनिवार को सफलतापूर्वक कक्षा में भेजा. यह व्यावसायिक अंतरिक्ष यात्रा के इतिहास में नये अध्याय की शुरुआत है.

फ्लोरिडा के केनेडी अंतरिक्ष केंद्र से हुआ यह प्रक्षेपण इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह करीब एक दशक में पहली बार है जब अमेरिकी जमीं से मानवों को कक्षा में भेजा गया है.

नासा के अंतरिक्ष यात्री बॉब बेह्नकेन (49) और डोग हर्ले (53) को लेकर स्पेसएक्स क्रू ड्रैगन अंतरिक्षयान ने नासा के केनेडी अंतरिक्ष केंद्र के प्रक्षेपण परिसर से कंपनी के फाल्कन 9 रॉकेट के जरिए तीन बजकर 22 मिनट पर उड़ान भरी.
इस प्रक्षेपण के साथ ही स्पेसएक्स पहली निजी कंपनी बन गई है जिसने मनुष्य को कक्षा में भेजा हो. इससे पहले केवल तीन सरकारों - अमेरिका, रूस और चीन को यह उपलब्धि हासिल है.

फिर से इस्तेमाल हो सकने वाले, गमड्रॉप (कैंडी) आकार के इस यान का नाम क्रू ड्रैगन है जो अब अमेरिकी अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र के 19 घंटे के सफर पर ले जाएगा. यह अंतरिक्षयान रविवार को सुबह 10 बजकर 29 मिनट पर आईएसएस पर होगा.
कोरोना वायरस के चलते पिछले तीन महीनों में एक लाख से अधिक देशवासियों को खो चुके अमेरिका के लिए यह सफल प्रक्षेपण खुशी का मौका लेकर आया है. इससे पहले पिछले हफ्ते खराब मौसम के चलते यह प्रक्षेपण टल गया था लेकिन अब वह पल हासिल कर लिया गया है अब इसके बाद जितने भी अंतरिक्ष यात्री होंगे उनको आसानी से स्पेस स्टेशन में लेकर जा सकेंगे और ये कम खर्च में हो भी जाएगा इस मिशन के कामयाब होने के बाद spacex को ज्यादातर contract मिलेगा और नासा को अपने अगले मिशन के लिए पूरा समय मिल जाया करेगा अब वह अपना पूरा ध्यान आने वाले कुछ महत्वपूर्ण मिशनों पर लगाएंगे

11/27/2019

आपने कभी आसमान से टूटते तारे देखे होंगे लेकिन ये तारे नहीं होते बल्कि धरती की तरफ तेजी से गिरते और दहकते हुए छोटे-छोटे उल्र्कांपड होते हैं। अब अमेरिकी अंतरित्र एजेंसी नासा को ऐसे ही दो उल्र्कांपडों पर शर्करा यानी चीनी होने के सबूत मिले हैं।

शोधकर्ताओं का कहना है कि अरबों साल पहले पृथ्वी से टकराने वाले उल्र्कांपडों में शर्करा होती थी। इस खोज से यह समर्थन मिलता है कि उल्र्कांपडों में जीवन के कुछ कारक पाए जा सकते हैं। नासा, एरिजोना यूनिवर्सिटी और जापान के वैज्ञानिकों ने दो अलग-अलग उल्र्कांपडों पर शर्करा की खोज की है। इस खोज से संबंधित रिपोर्ट नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज में बीते 18 नवंबर को प्रकाशित हुई है।

ऐसे हुई खोज : नासा का अंतरिक्ष यान ओसिरिस-रेक्स ऐसे ही उल्र्कांपडों का अध्ययन करने के लिए अंतरिक्ष में मौजूद है। उसी ने एस्टेरॉयड बेनू (छोटा तारा) का अध्ययन किया, जिसमें से टूटकर दो उल्र्कांपड एनडब्ल्यूए-801 और मर्चिसन बने हैं। ये उल्र्कांपड धरती पर आकर गिरे थे। फिर इन उल्र्कांपडों की रासायनिक जांच की गई। वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने कहा कि इन उल्र्कांपडों में जैव-आवश्यक शर्करा पाई गई है, जिसमें अन्य जैविक रूप से महत्वपूर्ण यौगिक शामिल हैं।

तीन उल्कापिंडों का विश्लेषण किया : नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज में प्रकाशित शोध में शोधकर्ताओं ने तीन उल्र्कांपडों का विश्लेषण किया। इनमें से एक ऑस्ट्रेलिया में 1969 में गिरा था। बाकी दो कई खरब साल पुराने बताए जा रहे हैं। शोधकर्ताओं ने हाइड्रोक्लोरिक अम्ल और पानी की मदद से उल्र्कांपडों में शर्करा की खोज की। इन उल्र्कांपडों में अराबिनोज, जाइलोज और मुख्य रूप से राइबोज शर्करा पाई गई है।

जीवन के लिए आवश्यक है राइबोज : नासा के अनुसार राइबोज नामक शर्करा हमारे मानव जीव विज्ञान में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह हमारे आरएनए (राइबोन्यूक्लिक एसिड) अणुओं में मौजूद है और हमारे शरीर को प्रोटीन बनाने में मदद करने के लिए हमारे डीएनए से संदेश देता है। यह उल्लेखनीय है कि इतनी प्राचीन सामग्री में भी राइबोज जैसे नाजुक अणु पाए गए हैं। राइबोज की खोज से यह पता चलता है कि आरएनए डीएनए से पहले बने होंगे। इससे वैज्ञानिकों को जीवन की उत्पत्ति के बारे में भी जानकारी मिलती है।

11/27/2019

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (Indian Space Research Organization - ISRO) ने चंद्रयान-3 (Chandrayaan-3) को अपनी तैयारी शुरू कर दी है. लेकिन इसमें कम से कम तीन साल का समय लगेगा. इसरो के विश्वस्त सूत्रों ने बताया कि अगले साल तक चंद्रयान-3 की लॉन्चिंग करना लगभग नामुमकिन है. क्योंकि, इसके लैंडर, रोवर, रॉकेट और पेलोड्स को तैयार करने में कम से कम तीन साल का समय तो लगेगा ही. मीडिया में खबरें चल रही हैं कि चंद्रयान-2 को नवंबर-2020 तक लॉन्च किया जा सकता है.इसरो के अहमदाबाद केंद्र स्थित एक उच्च पदस्थ सूत्र ने Our Galaxy को बताया कि किसी भी नए पेलोड यानी उपकरण को जरूरत के हिसाब से बनाने के लिए कम से कम तीन साल की रिसर्च होती है. इसके बाद उसकी डिजाइन बनती है. फिर शुरू होता है डेवलपमेंट का काम. अगर पहले से बने पेलोड का उपयोग भी करते हैं तो उसे फिर से बनाकर विकसित करने में कम से कम 6 महीने लगेंगे.
मान ले कि चंद्रयान-3 के लैंडर में चार और रोवर में 2 पुराने पेलोड भी लगाते हैं तो इन सबको बनाकर विकसित करने में करीब 2 साल लगेंगे. इसके बाद इन सभी पेलोड्स को आपस में इंटीग्रेड करने में करीब 8 महीने से एक साल का समय लगता है. इसके बाद लैंडर, रोवर को इंटीग्रेट किया जाता है. लेकिन बिना ऑर्बिटर के इन्हें अंतरिक्ष में नहीं भेजा जा सकता. इसलिए ऑर्बिटर भी बनाना पड़ेगा. ये हो सकता है कि ऑर्बिटर में कोई प्रायोगिक उपकरण न लगाए जाए. उसका उपयोग सिर्फ एक रॉकेट की तरह हो. ये भी हो सकता है कि कोई पेलोड निजी कंपनी या विदेश से मंगाना पड़े. ऐसे में और समय लगेगा.
हो सकता है कि इसरो की किसी समिति ने चंद्रयान-3 को लेकर सिफारिश की है. लेकिन इस सिफारिश को इसरो पहले विज्ञान मंत्रालय, वित्त मंत्रालय और पीएमओ भेजता है. सभी जगहों से अनुमति मिलने के बाद मिशन के लिए पैसे का एलॉटमेंट होता है. इसके बाद शुरू होता है मिशन को आगे बढ़ाने का काम. तब भी इन सबमें करीब कुल मिलाकर 3 से 4 साल का समय लगेगा. तब कहीं जाकर चंद्रयान-3 मिशन की लॉन्चिंग होगी.
अगर, चंद्रयान-3 में चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर का उपयोग भी करेंगे, तब भी लैंडर, रोवर, रॉकेट (PSLV या GSLV) बनाने में भी समय लगेगा. इसलिए चंद्रयान-3 मिशन इतनी जल्दी संभव नहीं. क्योंकि, अब भी चंद्रयान-2 के डेटा का विश्लेषण किया जा रहा है. गौरतलब है कि चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर सात सालों तक काम करेगा. इसलिए इसरो के पास अभी काफी समय है चंद्रयान-3 मिशन को वापस चांद पर भेजने के लिए.

हो सकता है चंद्रयान-3 पृथ्वी और चांद के कम चक्कर लगाए
ये संभव है कि चंद्रयान-3 मिशन में इसरो वैज्ञानिक चंद्रयान-3 की यात्रा का समय कम कर दे. यह करने के लिए उसे चंद्रयान-3 को पृथ्वी और चांद का कम चक्कर लगाने लायक बना दे. साथ ही लैंडर के पांव ज्यादा मजबूत बनाए जाएं. ताकि तेजी से लैंडिंग करने पर लैंडर को नुकसान न पहुंचे. वह क्रैश न हो.

10/03/2019

बेहद जहरीला होता है सेब का बीज, खाने से हो सकती है मौत
सेब, हमारी सेहत के लिए कितना गुणकारी यह बताने की जरूरत नहीं लेकिन यह पौष्टिक फल जानलेवा भी साबित हो सकता है। सेब का बीज बेहद जहरीला होता है और इसे खाने से इंसान की मौत तक हो सकती है।
सेब खाएं, लेकिन जरा संभलकर
सेब, हमारी सेहत के लिए कितना गुणकारी यह बताने की जरूरत नहीं लेकिन यह पौष्टिक फल जानलेवा भी साबित हो सकता है। जी हां, आपने बिल्कुल ठीक पढ़ा... सेब का बीज बेहद जहरीला होता है और इसे खाने से इंसान की मौत तक हो सकती है।
सेब के बीज में अमिगडलिन नाम का तत्व पाया जाता है और जब यह तत्व इंसान के पाचन संबंधी एन्जाइम के संपर्क में आता है तो यह सायनाइड रिलीज करने लगता है। अमिगडलिन में सायनाइड और चीनी होता है और जब इसे हमारा शरीर निगल लेता है तो वह हाईड्रोजन सायनाइड में तब्दील हो जाता है। इस सायनाइड से न सिर्फ आप बीमार हो सकते हैं बल्कि मौत का भी खतरा रहता है। हालांकि ऐक्सिडेंटली सेब का बीज खा लेने पर बेहद तीव्र जहरीलेपन के केस कम ही देखने को मिलते हैं।
कैसे काम करता है यह सायनाइड?
सायनाइड दुनिया का सबसे घातक जहर माना जाता है और सामूहिक आत्महत्या और केमिकल युद्ध के दौरान इससे होने वाली मौतों का लंबा इतिहास मौजूद है। सायनाइड हमारे शरीर में ऑक्सिजन की सप्लाई को बाधित कर देता है। लेकिन शायद आप नहीं जानते होंगे कि अपने केमिकल फॉर्म के अलावा कुछ फलों के बीज में भी सायनाइड पाया जाता है। इनमें ऐप्रिकॉट यानी खुबानी, चेरी, आड़ू, आलूबुखारा और सेब जैसे फल शामिल हैं। इन बीजों के ऊपर बेहद मजबूत कोटिंग होती है जिससे अमिगडलिन इसके अंदर बंद रहता है बेहद जहरीला होता है सेब का बीज
सायनाइड की कितनी मात्रा खतरनाक है
सेब के करीब 200 बीज का चूरण जो करीब 1 कप के आसपास हुआ वह इंसान के शरीर के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। सायनाइड, हृदय और मस्तिष्क को नुकसान पहुंचाता है। कुछ रेयर केस में इंसान कोमा में जा सकता है और उसकी मौत भी हो सकती है। अगर ज्यादा मात्रा में सायनाइड का सेवन कर लिया जाए तो तुरंत सांस लेने में तकलीफ शुरू हो जाती है, दिल की धड़कन बढ़ जाती है, ब्लड प्रेशर लो हो जाता है और इंसान बेहोश हो जाता है। अगर इस जहर से कोई शख्स बच जाता है तब भी उसके हृदय और मस्तिष्क को काफी नुकसान पहुंचता है। सायनाइड की थोड़ी सी मात्रा का सेवन करने पर भी चक्कर आना, सिरदर्द, उल्टी, पेट में दर्द और कमजोरी जैसी समस्याएं देखने को मिलती है।

Address

New Delhi
Charlotte, NC
110001

Telephone

+17042030292

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Our Galexy posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The University

Send a message to Our Galexy:

Share