Hindi/Sanskrit Learning

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20/09/2025

ॐ...
पुस्तकेषु हि या विद्या, परहस्तेषु यद् धनम्।
कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद् धनम्।।
अर्थ......
पुस्तक में रखी हुई विद्या अर्थात ज्ञान और दूसरे के हाथ में गया हुआ धन, समय आने पर न वह विद्या किसी काम की और न वह धन।
मित्रों....
हम सबके साथ ऐसा ही होता है विशेष रूप से बच्चों के साथ कि पढ़ कर भूल जाते हैं।समय पड़ने पर भूल जाते हैं कि क्या पढ़ा था। समय पड़ने पर वह विद्या काम न आ सकी तो उस विद्या का क्या फायदा। इसलिए जब भी पढ़ें समझ कर पढ़ें जो हमेशा याद रहता है।बेमन से पढ़ा हुआ और रटा हुआ जल्दी ही भूल जाते हैं।
इसी प्रकार दूसरे को दिया हुआ धन है। यदि हमने अपना धन किसी को उधार दिया हुआ है तो जब हमें उस धन की आवश्यकता पड़ती है तो वह धन हमारे पास होता ही नहीं है। क्योंकि वह व्यक्ति जल्दी से धन वापिस नहीं करता। मित्रों!! आजकल समय इतना खराब आ गया है कि सब एक दूसरे को धोखा देने में लगे हैं।ऐसे समय में अपना धन और अपनी विद्या अपने पास ही रखे।
ॐ शांति ॐ.......

22/02/2025

ॐ....
श्रोत्रं श्रुतेनैव न तु कुंडलेन,दानेन पाणिर्न तु कंकणेन,
विभाति कायः करुणापराणां,परोपकारैर्न तु चन्दनेन ||

अर्थ.....
कानों की शोभा कुण्डल से नहीं अपितु ज्ञान की बातें सुनने से होती हैं।हाथों की शोभा कंगन पहनने से नहीं अपितु दान देने से होती है।दयालु लोगों का शरीर दूसरों की भलाई के लिए होता है चन्दन लगाने के लिए नहीं होता है।
मित्रों !
आजकल का समय केवल दिखावे मात्र का ही हो गया है।सभी इसी दिखावे की होड़ में लगे रहते हैं कि किसके पास कितना धन है, कितनी भौतिक वस्तुएँ है। सोशल मीडिया का इसमें बहुत बड़ा हाथ है। हम अपने शरीर को कितने महंगे आभूषणों से सजा रहे हैं यही महत्वपूर्ण हो गया है, किन्तु वास्तविकता में उसकी उपयोगिता क्या है ये हम भूल ही गए हैं।कानों में सुंदर कुण्डल तो पहन लिए किन्तु उन कानों में अच्छी ज्ञान की बातें न जाए तो उन कानों की क्या उपयोगिता है।इसी प्रकार हाथों में सुंदर कंगन तो पहन लेते हैं पर उन हाथों से किसी का भला न किया हो,किसी को कुछ दान न दिया हो तो उन हाथों का क्या फायदा है।इसी प्रकार इस शरीर पर सुगंधित पदार्थ जैसे चन्दन आदि लगाने से क्या फायदा यदि इस शरीर से किसी का कोई परोपकार का काम नहीं किया तो। महर्षि दधीचि ने राक्षस और देवताओं के युद्ध में देवताओं को विजय दिलाने के लिए अपनी अस्थि भी दान में दे दी थी जिससे देवताओं को विजय मिले। राजा बलि ने एक कबूतर की जान बचाने के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया था। ऐसे महान परंपरावादी ऋषियों के देश में हम रहते हैं मित्रों हमें गर्व होना चाहिए । मित्रों!मानव जीवन एक ही बार मिलता है इसे व्यर्थ न जाने दें।
ॐ शान्ति ॐ....

12/06/2024

ॐ..
अय‌म निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम।
उदार चरितानाम तु वसुधैव कुटुंबकम्।।
अर्थ...
यह मेरा है,यह तेरा है,ऐसी सोच तो छोटे दिल वाले रखते हैं। बड़े दिल वालों के लिए तो पूरी पृथ्वी ही परिवार है।
मित्रों....
आजकल मोदी जी के माध्यम से "वसुधैव कुटुंबकम्" बहुत सुनने में आ रहा है। उन्होंने जी-20 का नारा भी यही दिया था। यही तो हमारी सनातन संस्कृति है जो हमे स्वार्थी बनने से रोकती है। हम सिर्फ अपना परिवार,अपने माता - पिता से ऊपर उठ कर पूरे विश्व को अपना परिवार मानते हैं। मित्रों! कोरोना के बाद तो यह बात और ज़्यादा उभर कर सामने आई है। इस वैश्विक बीमारी के समय जिस प्रकार से सब देशों ने एक दूसरे की एक पारिवारिक सदस्य की तरह मदद की वह सराहनीय है। इस समय मानवीयता मूल्य ही सर्वोपरि था। आजकल पश्चिमी सभ्यता की देखा- देखी भारत में भी एकल परिवारों का चलन हो गया है। किंतु मित्रों! अब समय आ गया है कि हमें अपने संस्कार, अपनी संस्कृति को अपनाना चाहिए। जब हमारे शाश्वत मूल्यों की चर्चा विश्व में हो रही है उन्हे अपनाया जा रहा है तो हमें तो अपनाना ही चाहिए।
ॐ शांति ॐ ...

14/09/2022

ॐ......
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।।
" भारतेंदु हरिश्चंद्र"
भावार्थ:
अपनी भाषा से ही उन्नति संभव है, क्योंकि यही सारी उन्नतियों का आधार है।अपनी मातृभाषा के ज्ञान के बिना हमारे हृदय की पीड़ा मिट नहीं सकती है।विभिन्न प्रकार की कलाएँ, असीमित शिक्षा तथा अनेक प्रकार का ज्ञान,सभी देशों से जरूर लेने चाहिये, परन्तु उनका प्रचार मातृभाषा में ही करना चाहिये।
मित्रों !
मातृ भाषा ही वह भाषा है जिसमें हम अपने विचारों को भलीभांति प्रकट कर सकते हैं और दूसरों के विचारों को समझ भी सकते हैं। मित्रों! आज हिंदी दिवस है।हमारे देश की कैसी विडंबना है कि आज अपने ही देश में हमें हिंदी दिवस मनाने की आवश्यकता पड़ रही है।मुगल शासन और अंग्रेजी शासन अब समाप्त हो चुका है,किंतु अंग्रेजी शासन की दासता की बेड़ियां अंग्रेजी के रूप में आज भी हमारे पैरों में पड़ी हैं।उन्होंने हमारी मानसिकता को इतना विकृत कर दिया कि उस से हम आज भी उबर नहीं पाए।वाल्टर चेनिंग ने कहा था कि - "विदेशी भाषा का किसी स्वतंत्र राष्ट्र के राज - काज में प्रयोग और शिक्षा की भाषा होना सांस्कृतिक दासता है। " मित्रों! हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं पर वास्तविक रूप से स्वतंत्र तभी होंगे जब हम अंग्रेजी से भी स्वतंत्र होंगे।अंग्रेजी भाषा सीखे पढ़े ज़रूर पर उसको अपनी भाषा बना लेना और अपनी मातृ भाषा हिंदी का निरादर करना ये ठीक नही है।जब से हमने अपनी मातृ भाषा का आदर करना छोड़ा है, तब से हमारी अवनति प्रारंभ हो गई।अंग्रेजी पढ़ना आवश्यक है क्योंकि उसके द्वारा हम आज के विज्ञान की प्रगति या बाकी देश दुनिया में क्या हो रहा है,जान पाते हैं।किंतु आम बोलचाल में अपनी ही भाषा का प्रयोग करना चाहिए। मित्रों! अपनी मातृ भाषा हिंदी किसी भी अन्य भाषा से कम नहीं है।हिंदी साहित्य का बहुत समृद्ध इतिहास है।कबीर दास जी ,रहीम दास जी ने तो दोहों के माध्यम से जीवन जीने की कला सिखाई है। तुलसी दास जी ने तो "राम चरित मानस" नामक महाकाव्य ही लिख डाला। राष्ट्र कवि "मैथिली शरण गुप्त" जी ने तो लिखा है _
"जिसको न निज गौरव तथा निज देश काअभिमान है,
वह नर नही नर पशु निरा है और मृतक समान है"
मित्रों!हमें अपने देश, अपनी भाषा पर गर्व करना चाहिए।
ॐ शांति....

15/07/2022

ॐ.....
जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः।
स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥
अर्थ...
पानी की एक -एक बूंद के गिरने से घड़ा भर जाता है।यही हेतु सब विद्याओं, धर्म, और धन के लिए है।( अर्थात कोई भी विद्या जैसे संगीत, कला ,खेलकूद आदि, धर्म और धन की भी धीरे - धीरे प्राप्ति होती है।)
मित्रों....
आजकल इतनी तेजी का समय आ गया है कि सेकंड के सौवे हिस्से का भी महत्व है।ऐसे में हर व्यक्ति चाहता है कि उसे जल्दी से सब कुछ हासिल हो जाए। किसी भी विद्या को सीखने के लिए बहुत धैर्य की आवश्यकता होती है।दिन रात कड़ी मेहनत करनी पड़ती है तब जाकर उस विद्या में पारंगत होते हैं।इसी प्रकार धर्म को सीखने के लिए धर्म की पुस्तकों का गहन अध्ययन करना होता है, तब धर्म पर चलने की राह समझ आती है।धन तो आजकल सब शॉर्टकट तरीके से कमाना चाहते हैं। रातों रात अमीर बनना चाहते है।इसके लिए गलत तरीकों का प्रयोग करने से भी नही हिचकते। इसके लिए माता - पिता भी बच्चों को शायद सही शिक्षा देने में चूक जाते हैं।उन्हें लगता है कि उनका बच्चा दुनिया की रेस में बस प्रथम आ जाए।उनके बच्चे जल्दी - जल्दी सब विद्याओं में पारंगत हो जाए।इसीलिए शॉर्टकट तरीके भी अपनाते हैं। आजकल स्वाध्याय की बहुत जरूरत है।अपने ग्रंथो को पढ़ कर हमें जीवन जीने की समझ आ जाती है ।कहा गया है कि ---
"कारज धीरे होत है, काहे होत अधीर।
समय पाय तरुवर फलै, केतक सींचे नीर।।
अर्थात हमें धैर्य रखना चाहिए।है काम धीरे - धीरे होता है।यदि माली पेड़ में ज़्यादा - ज़्यादा पानी देगा तो उसमें फल जल्दी नहीं आएंगे ,फल तो जब ऋतु आएगी तभी आयेंगे।बल्कि ज्यादा पानी से पौधे के खराब होने का डर है। इसी प्रकार माता - पिता को समझना चाहिए कि उनका बच्चा अपनी उम्र के साथ धीरे - धीरे सब सीख जायेगा।यदि उसको एक ही दिन में सब सिखा दिया जाए तो वह एक ही दिन में सब सीख नहीं जायेगा, अपनी उम्र से ज्यादा बड़ा नहीं हो जाएगा। इसीलिए इस प्रकार के श्लोकों का हमारे जीवन में बहुत महत्व है।हमें इन्हें आत्मसात करना चाहिए।.. ॐ शान्ति ॐ...

03/06/2022

ॐ......
काव्य शास्त्र विनोदेन, कालो गच्छति धीमताम्।
व्यसनेन च मूर्खाणां, निद्रयाकलहेन वा।।
अर्थ....
बुद्धिमान (विद्वान) मनुष्य अपना समय काव्य, शास्त्र के पठन -पाठन में लगाते हैं।मूर्ख (मनुष्य) अपना समय सोने में,व्यसन में और लड़ाई - झगड़े में लगाते हैं।
मित्रों...
समय अनमोल है इसलिए इसे बिना सोचे समझे खर्च नही करना चाहिए।मनुष्य जीवन बार -बार नही मिलता।इसलिए इस जीवन में जितने अच्छे काम हो सके करने चाहिए।अपने जीवन जीने के कुछ उद्देश्य बनाएं जो परोपकार के लिए हो या आत्म उत्थान के लिए हो या भगवान की भक्ति के लिए हो। मित्रों! इन सबसे हमारा ये जीवन तो कल्याणकारी होगा साथ ही अगला जन्म भी सुधर जायेगा। क्योंकि कहा गया है कि अगला जीवन हमे इस जीवन के कर्मों के आधार पर ही मिलता है।इसलिए शास्त्रों को पढ़ने में अपनी रुचि जागृत करें।शास्त्रों को पढ़ने से ही हमे जीवन जीने का आधार मिल जाता है।
ॐ शांति ॐ

02/05/2022

ॐ...
असतोर्मा सदगमय।
तमसोर्मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मामृतगमय।
अर्थ....
(हे भगवान ! मुझे)असत्य से सत्य की ओर ले कर चलो।अंधकार से प्रकाश की ओर ले कर चलो। मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।
मित्रों ...
आज के समय में इस प्रार्थना की अति आवश्यकता है। चारों ओर झूठ का साम्राज्य फैला हुआ है।समझ नही आता कि कौन झूठ बोल रहा है और कौन सच। ऐसे में हम भगवान से प्रार्थना करें कि हम सदा सत्य की राह पर चलें। मित्रों ! प्रार्थना में बहुत शक्ति होती है।यदि सच्चे मन से प्रार्थना की जाए तो जो प्रार्थना हम कर रहे हैं उसका प्रभाव हमारे जीवन पर अवश्य पड़ता है।विशेष रूप से हमें अपने बच्चों में अच्छे संस्कार डालने के लिए उनके साथ ये प्रार्थना अवश्य करनी चाहिए। अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने की प्रार्थना अर्थात अज्ञान रूपी अंधकार हमारे जीवन से समाप्त हो।भगवान सदा हमें सद्बुद्धि दे।अज्ञान रूपी नकारात्मकता हमारे जीवन से दूर हो। मित्रों! कहा भी गया है कि बिना विद्या के मुनष्य का जीवन पशु के समान होता है।मृत्यु से अमरता की ओर ले जाने वाली प्रार्थना हमारे जीवन पर बहुत गहरा असर डालती है। हमारे मनीषियों ने कहा है कि हमारी आयु सौ वर्ष की हो।हम न केवल सौ वर्ष जिए बल्कि स्वस्थ जीवन जिए। मित्रों! हमे इस प्रार्थना को पूरे परिवार के साथ नित्य करने का नियम बना लेना चाहिए। फिर देखिए जीवन में कैसे बदलाव आता है ।
ॐ शांति ॐ ...

05/02/2022

ॐ....
चोदयित्री सूनृतानाम् चेतंंती सुमतीनाम् ।
यज्ञम् दधे सरस्वती।।
अर्थ....
सरस्वती अर्थात विद्या दुखों को नष्ट करने वाली है। सत्य है।यह उत्तम विचारों को चेताने वाली होती है।यह विद्या मनुष्यों को श्रेष्ठ कर्मों की ओर प्रेरित करती है।
मित्रों....
आज बसंत पंचमी है।आज विद्या की देवी माँ सरस्वती की पूजा की जाती है।वैसे तो प्रतिदिन ही विद्या की देवी की पूजा करनी चहिए क्योंकि माँ सरस्वती की कृपा से ही हमें ज्ञान की प्राप्ति होती है।एक ज्ञानी व्यक्ति ही ऐसी बात करता है जो सत्य होती है और दूसरों को भी प्रिय लगती है।विद्या मनुष्य को उत्तम विचारों से ओतप्रोत रखती है।जब मनुष्य के पास ज्ञान है, सत्य, प्रिय और मधुर वाणी है, उसके पास उत्तम विचार हैं तो मनुष्य स्वयं ही अच्छे कर्मों की ओर अग्रसर होता है।
कहा भी है ___
विद्या ददाति विनयम् , विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति,धनात् धर्मं ततः सुखम् ।।

अर्थात __ विद्या यानि ज्ञान हमें विनम्रता देती है।विनम्रता से योग्यता आती है।योग्यता से धन आता है।धन से धर्म और उससे सुख मिलता है।
मित्रों... हमारे सुख का मूल कारण विद्या अर्थात ज्ञान है। इसलिए हमें सारी शक्ति ज्ञान प्राप्त करने में लगा देनी चाहिए।यदि हमारे पास ज्ञान होगा तो सब कुछ स्वतः ही संभव होगा।और उसके लिए विद्या की देवी माँ सरस्वती को कोटिशः नमन ।
ॐ शांति ॐ

22/01/2022

ॐ...
जाड्यं धियो हरति ,सिंचति वाचि सत्यं ,
मानोन्नतिं दिशति, पापमपाकरोति |
चेतः प्रसादयति ,दिक्षु तनोति कीर्तिं ,
सत्संगतिः कथय किं न करोति पुंसाम् ||

अर्थ.....
अच्छे मित्रों का साथ बुद्धि की जड़ता को हर लेता है, वाणी में सत्य का संचार करता है, मान और उन्नति को बढ़ाता है और पाप से दूर करता है| मन को प्रसन्न करता है और (हमारी) कीर्ति को सभी दिशाओं में फैलाता है|(आप ही) कहें कि अच्छी संगति मनुष्यों का कौन सा भला नहीं करती (अर्थात सब करती है)|

मित्रो...
आज के इस कलयुग में जब मनुष्य इतना स्वार्थी हो गया है कि वह सिर्फ अपने ही बारे में सोचता है, ऐसे में यदि कोई सच्चा मित्र मिल जाए तो दुनिया से स्वार्थ, बुराई, तनाव, अवसाद जैसी बीमारियां आदि सब ही समाप्त हो जाए ।

यदि एक सच्चा मित्र मिल जाए तो वह अपने मित्र की बुद्धि को सही राह पर लेकर आ सकता है। यदि वह कोई गलत काम करने जा रहा हो तो उसे रोकता है। उसे झूठ बोलने से रोकता है सदा सत्य की ओर प्रेरित करता है।
एक सच्चा मित्र ही तो होता है जो सबके सामने अपने मित्र का मान सम्मान बढ़ाता है अर्थात सबके सामने उसकी तारीफ़ करता है। उसे गलत काम करने से रोकता है। उसे हर समय प्रसन्न रखने की कोशिश करता है अर्थात उसे हर दुःख से दूर रखने की कोशिश करता है।सभी ओर उसका यश,उसका नाम रोशन करता है।

मित्रों! एक सच्चा मित्र ही अपने मित्र के लिए कुछ भी कर सकता है।उसे कभी नीचा नहीं देखने देगा, हमेशा उसे बुरे रास्ते से हटा कर सच्चा मार्ग दिखायेगा, पर साथ ही साथ उस व्यक्ति को भी अपने मित्र पर भरोसा होना चाहिए कि वह उसके लिए सदा भला ही सोचेगा।

मित्रों! आजकल किसी पर भी भरोसा करना इतना आसान नहीं है। ऐसे में मित्रों का चुनाव बहुत सोच समझ कर करना चाहिए।

एक सच्चा मित्र ही जिंदगी को संवार सकता है।
...ॐ शांति ॐ...

08/01/2022

ॐ...

येषां न विद्या,न तपो न दानं, ज्ञानं न शीलं, गुणो न धर्म:।
ते मृत्युलोके भुवि भारभूता, मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति।।

अर्थ ...
जिनके पास न विद्या(शिक्षा)है, न तप है, न दान(करते)है, न ज्ञान है, न शील है, न (अन्य कोई) गुण हैऔर न धर्म है।वे इस संसार में पृथ्वी पर बोझ बन कर मनुष्य के रूप में पशुओं की तरह घूमते हैं।
मित्रों...
हमारे मनीषियों ने बहुत अध्ययन के बाद ये"सुभाषितानि" अर्थात अच्छे विचारणीय श्लोक, लिखे हैं।जिनसे व्यक्तियों को सही ढंग से जीने की कला मिले।सही में जिस व्यक्ति ने न तो विद्या अर्जित की है, न ही किसी प्रकार की तपस्या की है, न ही किसी को दान देने में कोई रुचि है, न ही ज्ञान अर्जित करने की चेष्टा की है, न ही उसका आचरण अच्छा है, न ही अपने अंदर गुणों को विकसित किया और न ही उसका आचरण धार्मिक है।ऐसे व्यक्तियों का जीवन तो पशुओं के समान ही होगा।जैसे पशुओं का जीवन ध्येय रहित होता है।वैसे ही ऐसे व्यक्ति धरती पर बोझ के समान ही होते हैं।मित्रों! हमें अपने जीवन में अच्छी आदतों का विकास करना ही चाहिए।ज़रूरी नहीं कि हम सर्व गुण सम्पन्न हों पर कुछ अच्छे गुण तो विकसित कर ही सकते हैं।सर्व प्रथम विद्या का गुण है।यदि किसी ने विद्या अर्जन कर लिया तो उसे जीवन के तौर तरीके विद्या ही सिखा देगी।और यदि कोई व्यक्ति तपस्या में लीन है तो उसे मोक्ष का रास्ता मिल जायेगा।मित्रों! तपस्या का मतलब यह बिल्कुल नहीं कि हम संसार को त्याग कर साधु बन जाएं।संसार में रह कर भी तपस्या की जा सकती है।बस अपनी इन्द्रियों, वाणी तथा मन पर सयंम रखने की आवश्यकता है।और दान देना तो महान व्यक्तियों की निशानी है।कहा गया है-"दानेन पाणिर्न न तु कङ्कणेन" अर्थात कंगन से हाथ की शोभा नहीं होती बल्कि दान देने से होती है।दानी व्यक्ति हर समय परोपकार की ही सोचता है।और एक ज्ञानी व्यक्ति तो समाज के लिए आदर्श होता है।वह सबको जीवन जीने की राह दिखाता है।अच्छे आचरण वाला व्यक्ति तो सबका प्रिय होता है।अपने अच्छे आचरण से उसके सारे कार्य सिद्ध होते हैं।और जो व्यक्ति धार्मिक होता है उसका यह लोक तो सँवरता ही है साथ ही वह दूसरे जन्म को भी सुधार लेता है।मित्रों!यह मानव जीवन बहुत दुर्लभ है इसे ऐसे ही व्यर्थ न जाने दे।अपने अंदर अच्छी आदतों को रुचियों को विकसित कर ही लेना चाहिए।तभी हम इस संसार के आवागमन के चक्र से बच सकते हैं।मोक्ष की प्राप्ति का रास्ता खोल सकते हैं।वरना तो पशुओं के समान ही रहेंगे जिन्हें किसी बात का कोई भान ही नहीं है।...ॐ शांति ॐ...

20/12/2021

ॐ...
नाभिषेको न संस्कारः,सिंहस्य क्रियते वने।
विक्रमार्जितसत्वस्य,स्वयमेव मृगेन्द्रता।।
अर्थ....
शेर का जंगल में न तो कोई संस्कार किया जाता है और न ही राज्याभिषेक किया जाता है।वह अपने स्वयं के पराक्रम से अर्जित गुणों के द्वारा स्वयं ही(जंगल के)जानवरों का राजा बन जाता है।
मित्रों.....
शेर को जंगल में कोई भी औपचारिक तौर पर राज्याभिषेक आदि करके राजा नहीं बनाता है।परन्तु उसका पराक्रम और उसके गुण उसे स्वयं ही राजा घोषित कर देते हैं।इसी प्रकार हमें भी जीवन में किसी से अपने गुणों के लिए प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है बल्कि हमारे गुण हमारे आचरण से स्वतः ही प्रकट होने चाहिए जिससे सब बिना कहे ही हमारे अनुयायी बन जाये।इतिहास में देखें तो इसके अनेकों उदाहरण भरे पड़े हैं-भगवान राम, अनेकों ऋषि मुनियों से लेकर ऐ. पी. जे.अब्दुल कलाम तक।इन सबका जीवन चरित्र इतनी विशेषताओं से भरा पड़ा है कि सब इन्हें अपना आदर्श मानते हैं।तो जीवन में सबसे ज़्यादा आवश्यक है, अपने अंदर अच्छे गुणों का विकास।कभी यह न सोचें कि मेरे अंदर तो कोई गुण ही नहीं है।अपने आप को कमजोर न समझें।कमजोरी तो कायरता की निशानी है।मित्रों! हम सभी गुणों की खान हैं।आवयश्कता है तो उनको पहचानने की तथा उनको विकसित कर आचरण में लाने की।

ॐ शांति ॐ

12/12/2021

ॐ...
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृह।
निर्ममो निरहंकार सः शान्तिमधिगच्छति।।
अर्थ....
जो मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओं का त्याग करके स्पृह(कामना)रहित,ममता रहित, और अहंकार रहित होकर आचरण करता है, वह शांति को प्राप्त होता है।
मित्रों....
कामना,ममता और अहंकार ऐसी चीजें हैं जिन्हें मनुष्य छोड़ने में सर्वथा असमर्थ है।लेकिन यदि उसने इन सबको अपने वश में कर लिया तो उसे सम्पूर्ण शांति मिल जाती है।क्योंकि कामना, ममता,ये सब हमेशा चलायमान हैं, कभी एक सी नहीं रहती।जब बच्चा छोटा होता है तो उसे खिलौनों की कामना रहती है।माँ में उसे सबसे ज्यादा ममता रहती है।पर समय के साथ ये सब बदलते रहते हैं।बच्चा बड़े होकर खिलौनों की जगह किसी और चीज़ की कामना करता है।माँ के स्थान पर बहन,भाई,पति,पत्नी या मित्र किसी और में ज़्यादा ममता होने लगती है।तो जो स्वयं स्थिर नहीं है, चलायमान है, जिसका आना-जाना निश्चित है, हम उसे पकड़े रहते हैं, तो वह शांति कैसे दे सकता है।शाश्वत तो भगवान की सत्ता है और हम उसे ही भूले बैठे हैं।इसलिए गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि यदि हमें जीवन में शांति चाहिए तो कामना,ममता और अहंकार का त्याग करना चाहिए।मित्रों! मुझे पता है यह बहुत कठिन है पर साथ ही भगवान श्री कृष्ण ने यह भी कहा है कि अभ्यास से सब सम्भव है।

ॐ शांति ॐ

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