19/10/2017
सर सय्यद अहमद ख़ान की महबूबा थी उनकी 'क़ौम'
सर सय्यद अहमद ख़ान की 200वीं जयंती अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में बड़े धूम-धाम से मनाई गई। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में रहते हुए अब तक मैंने सर सय्यद अहमद ख़ान के बारे में जो भी थोड़ा-सा जाना और समझा है, उसे आपके सामने प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा हूँ।
हिंदुस्तान के इतिहास के सर सय्यद अहमद ख़ान का नाम ऐसे व्यक्तियों में लिया जाता है, जिन्होंने अपनी क़ौम के उत्थान के लिए अपना तन, मन, धन सब न्योछावर कर दिया।
सन 1857 की क्रांति के बाद जैसी दुर्दशा भारतवासियों की हुई थी उससे उभरपाना ख़ुद एक क्रांति से कम नहीं था। भारतीयों के पास अंग्रेजों का सामना करने के लिए ना तो पर्याप्त हथियार थे, ना ही धन और ना ही शिक्षा। जिसके बलबूते पर हम उनका सामना कर पाते। सामना करना तो दूर की बात है उनसे छुपकर ख़ुद को बचा पाना बहुत मुश्किल काम था। 57 की लड़ाई में अंग्रेज़ फ़ौज ने सर सय्यद के घर को भी तहस नहस कर दिया था और जो कुछ भी मिला उसे लूटकर ले गए। उनके मामू और मामुजाद भाई का भी अंग्रेज़ों ने क़त्ल कर दिया था और ना जाने कई सगे-संबंधियों, दोस्तों को मौत के घाट उतार दिया। उनकी माँ अंग्रेज़ों से ख़ुद को बचाने के लिए कई दिन तक तबेले में भूखी छिपी रही, भूख और प्यास की वजह से उसी तबेले में उन्होंने आख़िरी सांस ली।
57 के विद्रोह के बाद अंग्रेज़ों की ग़लतियों का अहसास कराने के लिए उन्होंने अपने दोस्तों के मना करने के बावजूद 'असबाब-ए-बगावत-ए-हिंद' नामक किताब लिख डाली। जिसके बाद अंग्रेज सरकार द्वारा उनपर मुक़दमा कर दिया गया। पुस्तक में उठाए गए मुद्दे इस प्रकार हैं -
1. अंग्रेज़ी सरकार भारतीय जनता के मनोभवों का ध्यान किये बिना एक मुद्दत से उनके दिलों में बग़ावत भर रही थी।
2. अंग्रेज़ी सरकार जो विदेशी है और जिसके रस्म-रिवाज़, खानपान, रहन-सहन इत्यादि हिंदुस्तानियों से भिन्न हैं, उसके लिए अपेक्षित था कि वह सरकारी प्रशासन में भारत के प्रतिनिधियों की मदद लेती और कम से कम विधायिका काउंसिल में भारतवासियों को यथोचित स्थान देती।
3. अँग्रेजी सरकार को हिंदुस्तानियों की पीड़ा और कष्ट का तनिक भी अहसास नहीं था। उनका दुःख-दर्द प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था और सरकार सहानुभूति के दो शब्द भी नहीं कहती थी। जनता में सरकार की इस अमानुषी प्रवृति की प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी।
4. सीधे सादे हिंदुस्तानियों को कभी लालच देकर और कभी धमकी से ईसाई बनाने की पादरियों की कोशिश सरासर ग़लत थी। इससे जनता में ज़बरदस्त नाराज़गी पैदा हुई। 1855 में पादरी एडमंड ने राजधानी कलकत्ता से इस आशय की चिट्ठी प्रकाशित की कि भारत में ब्रिटिश राज्य पूरी तरह जम चुका है इसलिए हिंदुस्तानियों को चाहिए कि वे ईसाई धर्म स्वीकार कर लें। इस चिट्ठी से जनता में आक्रोश की लहर तेज़ हो गई।
5. निसंदेह हिंदुस्तानियों को शिकायत है कि सरकार ने उन्हें तरह तरह से अपमानित किया है। एक भद्र और शरीफ़ हिंदुस्तानी की एक साधारण से अंग्रेज के सामने इतनी इज़्ज़त भी नहीं है जितनी एक साधारण यूरोपियन की एक बड़े ड्यूक के सामने है।
इस पुस्तक का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए वे स्वयं लिखते हैं कि "अभी महाविद्रोह की राजनीति ठंडी नहीं पड़ी थी कि मैंने एक पुस्तक क़ौम की बेगुनाही साबित करने के उद्देश्य से लिखी जो 'कॉज़ेज़ ऑफ इंडियन रिवोल्ट' के नाम से थी। ..."
बाद में इस पुस्तक का असर अंग्रेज़ सरकार पर पड़ा। 1861 में अनेक हिंदुस्तानियों को विधायिका काउंसिल के सदस्य मनोनीत किये गए। सर सय्यद ने भारतवासियों को प्रशासन में उच्च पद न दिए जाने की भी शिकायत की थी। ब्रिटिश सरकार ने उनकी बात पर विचार किया और 1862 ई. में पहली बार किसी भारतीय के रूप में श्री शंभुनाथ हाईकोर्ट के जज नियुक्त हुए।
57 का लड़ाई ने सर सय्यद को पूरी तरह से झकझोर दिया था। यह उनके जीवन का एक ऐसा मोड़ था जहाँ सर सय्यद ने क़ौम की भलाई के लिए क़दम उठाए। सर सय्यद अपनी क़ौम के लिए इतने फ़िक्र-ओ-मंद थे कि कमउम्र में ही उनके सर के और दाढ़ी के बाल सफ़ेद हो गए थे। इतिहास दो व्यक्तियों का नाम लिया जाता है, जिनके कमउम्र में ही बाल सफ़ेद हो गए थे। एक बादशाह शाहजहां और दूसरे सर सय्यद अहमद ख़ान। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि बादशाह शाहजहाँ की महबूबा थी उनकी बीवी 'मुमताज़' और सर सय्यद अहमद ख़ान की महबूबा थी उनकी 'क़ौम'।
सर सय्यद के लिए 'क़ौम' शब्द किसी समुदाय विशेष के लिए नहीं था बल्कि पूरे हिंदुस्तान की जनता के लिए था। अपनी इस क़ौम की भलाई के लिए उन्होंने जो भी पहल की उसमें उनके हिंदू मित्रों ने भी बख़ूबी साथ दिया।
सर सय्यद का मानना था कि किसी भी क़ौम की उन्नति के लिए उसका शिक्षित होना अति आवश्यक है। अंग्रेज़ों की शिक्षा से, उनकी प्रगति से, उनकी सक्रियता से वह भलीभाँति परिचित थे। इसलिए हमें उनके बराबर पहुँचाने के लिए उनका सामना करने के लिए इस सोई हुई क़ौम को जोश से नहीं दिमाग़ से काम लेने की सलाह देते रहे। सर सय्यद ने वहाँ की तालीम, वहाँ के पुस्तकालय, वहाँ के विश्वविद्यालयों के बारे में जानने के लिए इंग्लिशतान का सफ़र किया। भारत में कई जगह पर छोटे छोटे स्कूल्स बनाने के साथ ही अलीगढ़ में साइंटिफिक सोसाइटी बनाने का निर्णय लिया, जिसमें अंग्रेजी पुस्तकों का अनुवाद उर्दू में किया जाता था जिसे भारतवासी अंग्रेज़ी शिक्षा और उनकी सोच से अवगत हो सकें।
आगे चलकर उनके प्रयासों और मित्रों के सहयोग से उन्होंने अलीगढ़ में 'मोहम्मडन एंग्लो ओरियंटल' कॉलेज की स्थापना 1875 ई. में की, जहाँ छात्रों की पढ़ाई के साथ-साथ उनके रहने के लिए छात्रावास की भी सुविधा थी। लड़कों की शिक्षा के साथ ही सर सय्यद लड़कियों को भी शिक्षा देने के पक्षपाती थे और उन्होंने लड़कियों के लिए भी स्कूल्स और कॉलेजेज बनवाए। अलीगढ़ का अब्दुल्ला हॉल भारत के एक बड़े गर्ल्स कॉलेज के रूप में प्रसिद्ध है, जहाँ दुनियाभर से लड़कियाँ आकर तालीम हासिल करती हैं। मोहम्मडन एंग्लो ओरियंटल कॉलेज आगे चलकर 1920 ई. में 'अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी' एक केंद्रीय विश्वविद्यालय के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। जिसमें पहले स्नातक 'श्री ईश्वरीप्रसाद' और पहले परास्नातक 'श्री अंबा प्रसाद' हुए थे।
सर सय्यद अहमद ख़ान ने जो पौधे 1857 की बाद लगाये है वे उनसे कई बड़े बड़े दरख़्त बने और जो हमारे ऊपर सर सय्यद का आशीर्वाद बनकर छाए हुए हैं।
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शोधार्थी, हिंदी विभाग
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़