03/01/2026
भारत की प्रथम महिला शिक्षिका- सह- स्त्री मुक्ति की प्रतिमूर्ति: सावित्रीबाई फुले
डॉ. सुभाष चन्द्र राम
वरीय सहायक प्राचार्य
हिन्दी विभाग
एल. एन. एम. एस. कॉलेज, बीरपुर, सुपौल
परिचय
आज 03 जनवरी 2026 है और आज का दिन स्मरणीय एवं चिरवंदनीय इसलिए है कि आज भारत की प्रथम महिला शिक्षिका सावित्री बाई फुले की जयंती है। इस जयंती पर हम उन्हें नमन करते हैं।
सावित्रीबाई फुले भारतीय इतिहास की एक ऐसी क्रांतिकारी महिला हैं जिन्होंने 19वीं शताब्दी में महिलाओं की शिक्षा और अधिकारों के लिए अथक संघर्ष किया। वे न केवल भारत की पहली महिला शिक्षिका थीं, बल्कि महिला मुक्ति आंदोलन की प्रतीक भी मानी जाती हैं। उनका जीवन सामाजिक रूढ़िवादिता, जाति प्रथा और लिंग भेदभाव के खिलाफ एक सतत लड़ाई का प्रतीक है। सावित्रीबाई ने अपने पति ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर महिलाओं और दलितों के उत्थान के लिए कई संस्थाएं स्थापित कीं, जो आज भी प्रेरणा का स्रोत हैं। यह लेख उनके जीवन, योगदान और विरासत पर आधारित है।
जीवन परिचय
सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव में एक किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम खंडोजी नेवासे पाटिल और माता का नाम लक्ष्मी था। वे परिवार की सबसे बड़ी बेटी थीं। उस समय की प्रथा के अनुसार, मात्र 9 वर्ष की आयु में 1840 में उनका विवाह 13 वर्षीय ज्योतिराव फुले से हो गया। विवाह के समय सावित्रीबाई निरक्षर थीं, लेकिन ज्योतिराव ने उन्हें पढ़ना-लिखना सिखाया। उन्होंने अहमदनगर और पूणे में ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित संस्थानों में शिक्षक प्रशिक्षण प्राप्त किया और 1847 में शिक्षिका के रूप में योग्य हुईं।उनके जीवन में कई चुनौतियां आईं, जैसे परिवार का विरोध और सामाजिक बहिष्कार, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। 10 मार्च 1897 को प्लेग महामारी के दौरान रोगियों की सेवा करते हुए उनकी मृत्यु हो गई।
महिला शिक्षा में योगदान
सावित्रीबाई फुले को महिला शिक्षा की अग्रदूत माना जाता है। 1848 में उन्होंने और ज्योतिराव ने पूणे के भिड़े वाड़ा में भारत की पहली बालिका विद्यालय की स्थापना की, जिसमें शुरू में छह छात्राएं थीं। यह स्कूल निम्न जातियों की लड़कियों के लिए था। 1851 तक उन्होंने तीन स्कूल खोले, जिनमें 150 से अधिक छात्राएं पढ़ रही थीं। ब्रिटिश सरकार ने 1852 में उन्हें बॉम्बे प्रेसिडेंसी की सर्वश्रेष्ठ शिक्षिका घोषित किया। उन्होंने फातिमा बेगम शेख को भारत की पहली मुस्लिम महिला शिक्षिका के रूप में नियुक्त किया। स्कूलों में नामांकन बढ़ाने के लिए वे घर-घर जाकर अभिभावकों को समझाती थीं और छात्राओं को प्रोत्साहन राशि प्रदान करती थीं। 1851 में उन्होंने दलित लड़कियों के लिए एक अलग स्कूल खोला। कुल मिलाकर, उन्होंने पूणे क्षेत्र में 18 स्कूल स्थापित किए। इन प्रयासों से महिलाओं को शिक्षा का अधिकार मिला, जो उस समय असंभव लगता था।
सामाजिक सुधार में योगदान
सावित्रीबाई ने केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ भी लड़ाई लड़ी। 1852 में उन्होंने 'महिला सेवा मंडल' की स्थापना की, जो महिलाओं के अधिकारों और आत्मसम्मान के लिए जागरूकता फैलाता था। 1854 में उन्होंने विधवाओं के लिए एक आश्रय गृह खोला, जहां विधवाओं, परित्यक्त महिलाओं और बाल वधुओं को शिक्षा और आश्रय प्रदान किया जाता था। 1863 में उन्होंने 'बालहत्या प्रतिबंधक गृह' स्थापित किया, जो ब्राह्मण विधवाओं द्वारा की जाने वाली कन्या भ्रूणहत्या को रोकने के लिए था। उन्होंने बाल विवाह, सती प्रथा और विधवा मुंडन जैसी प्रथाओं का विरोध किया तथा विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहित किया। 1873 में ज्योतिराव के साथ मिलकर उन्होंने 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना की, जो जाति प्रथा के खिलाफ था और दहेज रहित, ब्राह्मण पुरोहितों के बिना विवाह करवाता था। उन्होंने छुआछूत के खिलाफ संघर्ष किया और अपने घर में एक कुआं खुदवाकर सभी जातियों के लिए खोल दिया। 1896-97 के अकाल में उन्होंने 1500 बच्चों को भोजन प्रदान किया।
साहित्यिक योगदान
सावित्रीबाई एक कवयित्री भी थीं। उन्होंने 1854 में 'काव्य फुले' और 1892 में 'बावन काशी सुबोध रत्नाकर' नामक काव्य संग्रह प्रकाशित किए। उनकी कविताएं शिक्षा की महत्ता पर केंद्रित थीं, जैसे "जाओ, शिक्षा प्राप्त करो"। उन्होंने ज्योतिराव के भाषणों को संपादित कर 1856 में प्रकाशित किया। उनकी रचनाएं महिलाओं को प्रेरित करती थीं कि शिक्षा ही उनकी मुक्ति का मार्ग है।
विरासत और प्रभाव
सावित्रीबाई फुले की विरासत आज भी जीवित है। वे भारतीय नारीवाद की प्रतीक हैं। 1890 में ज्योतिराव की मृत्यु के बाद उन्होंने सत्यशोधक समाज का नेतृत्व किया और अंतिम संस्कार की रस्म खुद निभाई, जो पुरुषों के लिए आरक्षित थी। उनकी मृत्यु प्लेग रोगियों की सेवा करते हुए हुई। भारत सरकार ने 1998 में उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया। 2014 में पूणे विश्वविद्यालय का नाम सावित्रीबाई फुले पूणे विश्वविद्यालय रखा गया। 2017 में गूगल ने उनकी 186वीं जयंती पर डूडल बनाया। उनके प्रयासों से महिलाओं की शिक्षा और अधिकारों में क्रांतिकारी परिवर्तन आया, जो दलित और पिछड़े वर्गों के उत्थान में महत्वपूर्ण साबित हुए।
निष्कर्ष
सावित्रीबाई फुले स्त्री मुक्ति की सच्ची प्रतिमूर्ति हैं। उनके संघर्ष ने भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति को बदल दिया। आज जब हम महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, तो उनका नाम सबसे पहले आता है। उनके योगदान से प्रेरित होकर हमें सामाजिक समानता के लिए कार्य करना चाहिए।