27/10/2016
दीपावली कैसे मनाएं
पौराणिक कथा है कि लक्ष्मी जी समुंद्र मंथन से प्रकट हुई थी और उनके शरीर से सुगंघ निकल रही थी जब देवी लक्ष्मी जी विष्णु जी के सम्मुख आई तो उनके हाथों से स्वर्ण मुद्राएं बरस रही थी यह देख विषय जी प्रसन्न हो कर बोले कि देवी सम्पूर्ण पृथ्वी पर तुम्हारी पूजा होगी तभी से दीपावली पर धन लक्ष्मी कि पूजा होती है
विवाहित स्त्रियों द्वारा अपने नाम के पहले लगाने वाला शब्द श्रीमती का अर्थ भी लक्ष्मी है
लक्ष्मी का स्वरुप गौ माता में भी समाहित है श्रीसूक्त के अनुसार गोबर पृथ्वी कि सुगंध है जो पृथ्वी कि उपजाऊ भी बनाता है देव स्वरुप कि उत्पत्ति भी इसी से होती है
दीपावली का भोग: लक्ष्मी जी को चावल से बनी खाद्य सामग्री व् सफ़ेद चीज़े अत्यंत प्रिय है जैसे खील-बताशे, सफ़ेद मिठाई, मखाना विशेषकर प्रिय है क्योकि इसकी उत्पत्ति समुद्र मंथन के समय उन्ही के साथ हुई थी . जल में उत्पन्न होने के कारण सिंघाड़ा उन्हें प्रिय है इसका भोग भी अवश्य लगाना चाहिए विष्णु जी को प्रिय बेसन कि मिठाई विष्णुप्रिय लक्ष्मी जी को भी बहुत प्रिय है इसके साथ ही नारियल और मीठा पान भी भोग अर्पित करना शुभ माना जाता है
दीप महोत्सव का प्रारम्भ धनतेरस को 13 दीयों से और नरका चौदस को 14 दीयों से तत्पश्चात दिवाली को 15 दीयों को अवश्य प्रज्वलित किया जाता है अन्नकूट व् भाईदूज को क्रमश: 14 व 13 दिए प्रज्वलित करने का विधान है
सरस्वती देवी का चित्र क्यों: सरस्वती देवी का चित्र दिवाली कि पूजा में पूजित करना आवश्यक है क्योंकि अपार लक्ष्मी अनियंत्रित न हो जाये इसलिए देवी सरस्वती कि उपस्थिति आवश्यक होती है लक्ष्मी पूजा में गणेश जी चूकि प्रथम पूजित देव है तथा निर्विघ्न कार्य पूर्ण हो इसलिए गणेश जी कि उपस्थिति भी आवश्यक है
आजकल बाज़ारों में विभिन्न प्रकार कि धातु, प्लास्टिक व अन्य चीजो से बनी फ्रेम अथवा बॉक्स में रखी मूर्तियां प्रचलित है परंतु कागज़ पर हाथ से बनाये गए रंगीन चित्र सर्वश्रेष्ठ होते है पूजन के पश्चात् ये चित्र मंत्र स्वरुप हो जाता है जिसे तिजोरी में रखना श्रेष्ठ होता है
लक्ष्मी जी के वस्त्र लाल रंग के होने चाहिए खड़ी लक्ष्मी कि पूजा न करें दीपावली पूजन में लाल रंग के कपडे पर देवी को बैठाना चाहिए काला व नीला सर्वथा वर्जित है लक्ष्मी पूजा के लिए गुलाबी रंग का कमल सर्वश्रेष्ठ है इसके अभाव में लाल गुलाब जैसे किसी भी सुगन्धित फूल लिए जा सकते है गृह सज्जा में गैंदे के फूलों का प्रयोग किया जा सकता है
तीव्र ध्वनि वाले पटाखों का प्रयोग नहीं करना चाहिए: लक्ष्मी जी शांति प्रिय है जब नृसिंह अवतार में भगवन विष्णु ने दहाड़ भरी थी तो लक्ष्मी जी अचंभित हो गयी थी तब भक्त प्रहलाद ने उन्हें शांत किया था इसलिये पूजन के पश्चात् लक्ष्मी जी के स्वागत में आतिशबाज़ी कि प्रथा है जो देखने में सुंदर व व ध्वनि कर्णप्रिय हो जैसे फूलझड़ी अनार चकरी आदि
गृहस्थ के लिए शाम को लक्ष्मी पूजा श्रेष्ठ होती है सात्विक साधक के लिये रात्रि व तांत्रिक साधक को देर रात्रि जिसे महानिशीथ काल कहते है