Bundelkhand Institute of Engineering & Technology, Jhansi

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Bundelkhand Institute of Engineering & Technology, Jhansi Bundelkhand Institute of Engineering & Technology, Jhansi has proved to be the most preferred destination for aspiring technologists across the country.

The institute consistently attracts the finest faculty and the best of students for its Bachelor's and Master's programmes. B.I.E.T has a rich tradition of pursuing excellence and has continually re-invented itself in terms of academic programmes and research infrastructure. Students are exposed to challenging research based academics and a host of sport, cultural and organizational activities on

its vibrant campus. The presence of world class facilities, vigorous institute-industry collaboration programmes, interdisciplinary research collaborations and industrial training opportunities help students of B.I.E.T to excel and be ahead in the competitive professional environment. In the last twenty years, B.I.E.T has produced many illustrious professionals, whose contributions at national and international levels have been significant.

12/11/2019



"सफर" एक कहानी।

ट्रेन चलने को ही थी कि अचानक कोई जाना पहचाना सा चेहरा जर्नल बोगी में आ गया। मैं अकेली सफर पर थी। सब अजनबी चेहरे थे। स्लीपर का टिकिट नही मिला तो जर्नल डिब्बे में ही बैठना पड़ा। मगर यहां ऐसे हालात में उस शख्स से मिलना। जिंदगी के लिए एक संजीवनी के समान था।

जिंदगी भी कमबख्त कभी कभी अजीब से मोड़ पर ले आती है। ऐसे हालातों से सामना करवा देती है जिसकी कल्पना तो क्या कभी ख्याल भी नही कर सकते ।

वो आया और मेरे पास ही खाली जगह पर बैठ गया। ना मेरी तरफ देखा। ना पहचानने की कोशिश की। कुछ इंच की दूरी बना कर चुप चाप पास आकर बैठ गया। बाहर सावन की रिमझिम लगी थी। इस कारण वो कुछ भीग गया था। मैने कनखियों से नजर बचा कर उसे देखा। उम्र के इस मोड़ पर भी कमबख्त वैसा का वैसा ही था। हां कुछ भारी हो गया था। मगर इतना ज्यादा भी नही।
फिर उसने जेब से चश्मा निकाला और मोबाइल में लग गया।

चश्मा देख कर मुझे कुछ आश्चर्य हुआ। उम्र का यही एक निशान उस पर नजर आया था कि आंखों पर चश्मा चढ़ गया था। चेहरे पर और सर पे मैने सफेद बाल खोजने की कोशिश की मग़र मुझे नही दिखे।

मैंने जल्दी से सर पर साड़ी का पल्लू डाल लिया। बालो को डाई किए काफी दिन हो गए थे मुझे। ज्यादा तो नही थे सफेद बाल मेरे सर पे। मगर इतने जरूर थे कि गौर से देखो तो नजर आ जाए।

मैं उठकर बाथरूम गई। हैंड बैग से फेसवाश निकाला चेहरे को ढंग से धोया फिर शीशे में चेहरे को गौर से देखा। पसंद तो नही आया मगर अजीब सा मुँह बना कर मैने शीशा वापस बैग में डाला और वापस अपनी जगह पर आ गई।

मग़र वो साहब तो खिड़की की तरफ से मेरा बैग सरकाकर खुद खिड़की के पास बैठ गए थे।
मुझे पूरी तरह देखा भी नही बस बिना देखे ही कहा, " सॉरी, भाग कर चढ़ा तो पसीना आ गया था । थोड़ा सुख जाए फिर अपनी जगह बैठ जाऊंगा।" फिर वह अपने मोबाइल में लग गया। मेरी इच्छा जानने की कोशिश भी नही की। उसकी यही बात हमेशा मुझे बुरी लगती थी। फिर भी ना जाने उसमे ऐसा क्या था कि आज तक मैंने उसे नही भुलाया। एक वो था कि दस सालों में ही भूल गया। मैंने सोचा शायद अभी तक गौर नही किया। पहचान लेगा। थोड़ी मोटी हो गई हूँ। शायद इसलिए नही पहचाना। मैं उदास हो गई।

जिस शख्स को जीवन मे कभी भुला ही नही पाई उसको मेरा चेहरा ही याद नही😔

माना कि ये औरतों और लड़कियों को ताड़ने की इसकी आदत नही मग़र पहचाने भी नही😔

शादीशुदा है। मैं भी शादीशुदा हुँ जानती थी इसके साथ रहना मुश्किल है मग़र इसका मतलब यह तो नही कि अपने खयालो को अपने सपनो को जीना छोड़ दूं।
एक तमन्ना थी कि कुछ पल खुल के उसके साथ गुजारूं। माहौल दोस्ताना ही हो मग़र हो तो सही😔

आज वही शख्स पास बैठा था जिसे स्कूल टाइम से मैने दिल मे बसा रखा था। सोसल मीडिया पर उसके सारे एकाउंट चोरी छुपे देखा करती थी। उसकी हर कविता, हर शायरी में खुद को खोजा करती थी। वह तो आज पहचान ही नही रहा😔

माना कि हम लोगों में कभी प्यार की पींगे नही चली। ना कभी इजहार हुआ। हां वो हमेशा मेरी केयर करता था, और मैं उसकी केयर करती थी। कॉलेज छुटा तो मेरी शादी हो गई और वो फ़ौज में चला गया। फिर उसकी शादी हुई। जब भी गांव गई उसकी सारी खबर ले आती थी।

बस ऐसे ही जिंदगी गुजर गई।

आधे घण्टे से ऊपर हो गया। वो आराम से खिड़की के पास बैठा मोबाइल में लगा था। देखना तो दूर चेहरा भी ऊपर नही किया😔

मैं कभी मोबाइल में देखती कभी उसकी तरफ। सोसल मीडिया पर उसके एकाउंट खोल कर देखे। तस्वीर मिलाई। वही था। पक्का वही। कोई शक नही था। वैसे भी हम महिलाएं पहचानने में कभी भी धोखा नही खा सकती। 20 साल बाद भी सिर्फ आंखों से पहचान ले☺️
फिर और कुछ वक्त गुजरा। माहौल वैसा का वैसा था। मैं बस पहलू बदलती रही।

फिर अचानक टीटी आ गया। सबसे टिकिट पूछ रहा था।
मैंने अपना टिकिट दिखा दिया। उससे पूछा तो उसने कहा नही है।

टीटी बोला, "फाइन लगेगा"
वह बोला, "लगा दो"
टीटी, " कहाँ का टिकिट बनाऊं?"

उसने जल्दी से जवाब नही दिया। मेरी तरफ देखने लगा। मैं कुछ समझी नही।
उसने मेरे हाथ मे थमी टिकिट को गौर से देखा फिर टीटी से बोला, " कानपुर।"
टीटी ने कानपुर की टिकिट बना कर दी। और पैसे लेकर चला गया।
वह फिर से मोबाइल में तल्लीन हो गया।

आखिर मुझसे रहा नही गया। मैंने पूछ ही लिया,"कानपुर में कहाँ रहते हो?"
वह मोबाइल में नजरें गढ़ाए हुए ही बोला, " कहीँ नही"
वह चुप हो गया तो मैं फिर बोली, "किसी काम से जा रहे हो"
वह बोला, "हाँ"

अब मै चुप हो गई। वह अजनबी की तरह बात कर रहा था और अजनबी से कैसे पूछ लूँ किस काम से जा रहे हो।
कुछ देर चुप रहने के बाद फिर मैंने पूछ ही लिया, "वहां शायद आप नौकरी करते हो?"
उसने कहा,"नही"

मैंने फिर हिम्मत कर के पूछा "तो किसी से मिलने जा रहे हो?"
वही संक्षिप्त उत्तर ,"नही"
आखरी जवाब सुनकर मेरी हिम्मत नही हुई कि और भी कुछ पूछूँ। अजीब आदमी था । बिना काम सफर कर रहा था।
मैं मुँह फेर कर अपने मोबाइल में लग गई।
कुछ देर बाद खुद ही बोला, " ये भी पूछ लो क्यों जा रहा हूँ कानपुर?"

मेरे मुंह से जल्दी में निकला," बताओ, क्यों जा रहे हो?"
फिर अपने ही उतावलेपन पर मुझे शर्म सी आ गई।
उसने थोड़ा सा मुस्कराते हुवे कहा, " एक पुरानी दोस्त मिल गई। जो आज अकेले सफर पर जा रही थी। फौजी आदमी हूँ। सुरक्षा करना मेरा कर्तव्य है । अकेले कैसे जाने देता। इसलिए उसे कानपुर तक छोड़ने जा रहा हूँ। " इतना सुनकर मेरा दिल जोर से धड़का। नॉर्मल नही रह सकी मैं।

मग़र मन के भावों को दबाने का असफल प्रयत्न करते हुए मैने हिम्मत कर के फिर पूछा, " कहाँ है वो दोस्त?"
कमबख्त फिर मुस्कराता हुआ बोला," यहीं मेरे पास बैठी है ना"

इतना सुनकर मेरे सब कुछ समझ मे आ गया। कि क्यों उसने टिकिट नही लिया। क्योंकि उसे तो पता ही नही था मैं कहाँ जा रही हूं। सिर्फ और सिर्फ मेरे लिए वह दिल्ली से कानपुर का सफर कर रहा था। जान कर इतनी खुशी मिली कि आंखों में आंसू आ गए।

दिल के भीतर एक गोला सा बना और फट गया। परिणाम में आंखे तो भिगनी ही थी।
बोला, "रो क्यों रही हो?"

मै बस इतना ही कह पाई," तुम मर्द हो नही समझ सकते"
वह बोला, " क्योंकि थोड़ा बहुत लिख लेता हूँ इसलिए एक कवि और लेखक भी हूँ। सब समझ सकता हूँ।"
मैंने खुद को संभालते हुए कहा "शुक्रिया, मुझे पहचानने के लिए और मेरे लिए इतना टाइम निकालने के लिए"
वह बोला, "प्लेटफार्म पर अकेली घूम रही थी। कोई साथ नही दिखा तो आना पड़ा। कल ही रक्षा बंधन था। इसलिए बहुत भीड़ है। तुमको यूँ अकेले सफर नही करना चाहिए।"

"क्या करती, उनको छुट्टी नही मिल रही थी। और भाई यहां दिल्ली में आकर बस गए। राखी बांधने तो आना ही था।" मैंने मजबूरी बताई।

"ऐसे भाइयों को राखी बांधने आई हो जिनको ये भी फिक्र नही कि बहिन इतना लंबा सफर अकेले कैसे करेगी?"

"भाई शादी के बाद भाई रहे ही नही। भाभियों के हो गए। मम्मी पापा रहे नही।"

कह कर मैं उदास हो गई।
वह फिर बोला, "तो पति को तो समझना चाहिए।"
"उनकी बहुत बिजी लाइफ है मैं ज्यादा डिस्टर्ब नही करती। और आजकल इतना खतरा नही रहा। कर लेती हुँ मैं अकेले सफर। तुम अपनी सुनाओ कैसे हो?"

"अच्छा हूँ, कट रही है जिंदगी"
"मेरी याद आती थी क्या?" मैंने हिम्मत कर के पूछा।
वो चुप हो गया।

कुछ नही बोला तो मैं फिर बोली, "सॉरी, यूँ ही पूछ लिया। अब तो परिपक्व हो गए हैं। कर सकते है ऐसी बात।"
उसने शर्ट की बाजू की बटन खोल कर हाथ मे पहना वो तांबे का कड़ा दिखाया जो मैंने ही फ्रेंडशिप डे पर उसे दिया था। बोला, " याद तो नही आती पर कमबख्त ये तेरी याद दिला देता था।"

कड़ा देख कर दिल को बहुत शुकुन मिला। मैं बोली "कभी सम्पर्क क्यों नही किया?"

वह बोला," डिस्टर्ब नही करना चाहता था। तुम्हारी अपनी जिंदगी है और मेरी अपनी जिंदगी है।"
मैंने डरते डरते पूछा," तुम्हे छू लुँ"

वह बोला, " पाप नही लगेगा?"
मै बोली," नही छू ने से नही लगता।"
और फिर मैं कानपुर तक उसका हाथ पकड़ कर बैठी रही।।

बहुत सी बातें हुईं।

जिंदगी का एक ऐसा यादगार दिन था जिसे आखरी सांस तक नही बुला पाऊंगी।
वह मुझे सुरक्षित घर छोड़ कर गया। रुका नही। बाहर से ही चला गया।

जम्मू थी उसकी ड्यूटी । चला गया।

उसके बाद उससे कभी बात नही हुई । क्योंकि हम दोनों ने एक दूसरे के फोन नम्बर नही लिए।

हांलांकि हमारे बीच कभी भी नापाक कुछ भी नही हुआ। एक पवित्र सा रिश्ता था। मगर रिश्तो की गरिमा बनाए रखना जरूरी था।

फिर ठीक एक महीने बाद मैंने अखबार में पढ़ा कि वो देश के लिए शहीद हो गया। क्या गुजरी होगी मुझ पर वर्णन नही कर सकती। उसके परिवार पर क्या गुजरी होगी। पता नही😔

लोक लाज के डर से मैं उसके अंतिम दर्शन भी नही कर सकी।

आज उससे मीले एक साल हो गया है आज भी रखबन्धन का दूसरा दिन है आज भी सफर कर रही हूँ। दिल्ली से कानपुर जा रही हूं। जानबूझकर जर्नल डिब्बे का टिकिट लिया है मैंने।

अकेली हूँ। न जाने दिल क्यों आस पाले बैठा है कि आज फिर आएगा और पसीना सुखाने के लिए उसी खिड़की के पास बैठेगा।

एक सफर वो था जिसमे कोई हमसफ़र था।
एक सफर आज है जिसमे उसकी यादें हमसफ़र है। बाकी जिंदगी का सफर जारी है देखते है कौन मिलता है कौन साथ छोड़ता है।

#साभार - अज्ञात लेखक ।

12/08/2019

"When my arms can’t reach people close to my heart, I always hug them with my prayers. May Allah’s peace be with all of you. A very Happy Eid Mubarak to All.

14/06/2018

पोस्ट अत्यधिक लम्बी है अतः दो या तीन बार मे पढ़े लेकिन पढ़े जरूर
प्रवीण

एक लड़का था. बहुत ब्रिलियंट था. सारी जिंदगी फर्स्ट आया. साइंस में हमेशा 100% स्कोर किया. अब ऐसे लड़के आम तौर पर इंजिनियर बनने चले जाते हैं, सो उसका भी सिलेक्शन हो गया IIT चेन्नई में. वहां से B Tech किया और वहां से आगे पढने अमेरिका चला गया. वहां से आगे की पढ़ाई पूरी की. M.Tech वगैरा कुछ किया होगा फिर उसने यूनिवर्सिटी ऑफ़ केलिफ़ोर्निआ से MBA किया.
अब इतना पढने के बाद तो वहां अच्छी नौकरी मिल ही जाती है. सुनते हैं कि वहां भी हमेशा टॉप ही किया. वहीं नौकरी करने लगा. बताया जाता है कि 5 बेडरूम का घर था उसके पास. शादी यहाँ चेन्नई की ही एक बेहद खूबसूरत लड़की से हुई थी. बताते हैं कि ससुर साहब भी कोई बड़े आदमी ही थे, कई किलो सोना दिया उन्होंने अपनी लड़की को दहेज़ में.
अब हमारे यहाँ आजकल के हिन्दुस्तान में इस से आदर्श जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती. एक आदमी और क्या मांग सकता है अपने जीवन में? पढ़ लिख के इंजिनियर बन गए, अमेरिका में सेटल हो गए, मोटी तनख्वाह की नौकरी, बीवी बच्चे, सुख ही सुख, इसके बाद हीरो हेरोइने सुखपूर्वक वहां की साफ़ सुथरी सड़कों पर भ्रष्टाचार मुक्त माहौल में सुखपूर्वक विचरने लगे, The End.
अब एक दोस्त हैं हमारे, भाई नीरज जाट जी. एक नंबर के घुमक्कड़ हैं, घर कम रहते हैं सफ़र में ज्यादा रहते हैं. ऐसी ऐसी जगह घूमने चल पड़ते हैं पैदल ही, 4 -6 दिन पहाड़ों पर घूमना, trekking करना उनके लिए आम बात है. ऐसे ऐसे दुर्गम स्थानों पर जाते है, फिर आ के किस्से सुनाते हैं,ब्लॉग लिखते हैं. उनका ब्लॉग पढ़ के मुझे थकावट हो जाती है, न रहने का ठिकाना न खाने का ठिकाना (सफ़र में), फिर भी कोई टेंशन नहीं, चल पड़े घूमने, बैग कंधे पर लाद के. मेरी बीवी कहती है अक्सर, कि एक तो तुम पहले ही आवारा थे ऊपर से ऐसे दोस्त पाल लिए, नीरज जाट जैसे, जो न खुद घर रहता है, न दूसरों को रहने देता है, बहला फुसला के ले जाता है अपने साथ. पर मुझे उनकी घुमक्कड़ी देख सुन के रश्क होता है, कितना रफ एंड टफ है यार ये आदमी, कितना जीवट है इसमें, बड़ी सख्त जान है.
आइये अब जरा कहानी के पहले पात्र पर दुबारा आ जाते हैं. तो आप उस इंजिनियर लड़के का क्या फ्यूचर देखते हैं लाइफ में? सब बढ़िया ही दीखता है? पर नहीं, आज से तीन साल पहले उसने वहीं अमेरिका में, सपरिवार आत्महत्या कर ली. अपनी पत्नी और बच्चों को गोली मार कर खुद को भी गोली मार ली. What went wrong? आखिर ऐसा क्या हुआ, गड़बड़ कहाँ हुई.
ये कदम उठाने से पहले उसने बाकायदा अपनी wife से discuss किया, फिर एक लम्बा su***de नोट लिखा और उसमें बाकायदा justify किया अपने इस कदम को और यहाँ तक लिखा कि यही सबसे श्रेष्ठ रास्ता था इन परिस्थितयों में. उनके इस केस को और उस su***de नोट को California Institute of Clinical Psychology ने study किया है. What went wrong?
हुआ यूँ था कि अमेरिका की आर्थिक मंदी में उसकी नौकरी चली गयी. बहुत दिन खाली बैठे रहे. नौकरियां ढूंढते रहे. फिर अपनी तनख्वाह कम करते गए और फिर भी जब नौकरी न मिली, मकान की किश्त जब टूट गयी, तो सड़क पे आने की नौबत आ गयी. कुछ दिन किसी पेट्रोल पम्प पे तेल भरा बताते हैं. साल भर ये सब बर्दाश्त किया और फिर अंत में ख़ुदकुशी कर ली... ख़ुशी ख़ुशी और उसकी बीवी भी इसके लिए राज़ी हो गयी, ख़ुशी ख़ुशी. जी हाँ लिखा है उन्होंने कि हम सब लोग बहुत खुश हैं, कि अब सब कुछ ठीक हो जायेगा, सब कष्ट ख़तम हो जायेंगे.
इस case study को ऐसे conclude किया है experts ने : This man was programmed for success but he was not trained,how to handle failure. यह व्यक्ति सफलता के लिए तो तैयार था, पर इसे जीवन में ये नहीं सिखाया गया कि असफलता का सामना कैसे किया जाए.
आइये ज़रा उसके जीवन पर शुरू से नज़र डालते हैं. बहुत तेज़ था पढने में, हमेशा फर्स्ट ही आया. ऐसे बहुत से Parents को मैं जानता हूँ जो यही चाहते हैं कि बस उनका बच्चा हमेशा फर्स्ट ही आये, कोई गलती न हो उस से. गलती करना तो यूँ मानो कोई बहुत बड़ा पाप कर दिया और इसके लिए वो सब कुछ करते हैं, हमेशा फर्स्ट आने के लिए. फिर ऐसे बच्चे चूंकि पढ़ाकू कुछ ज्यादा होते हैं सो खेल कूद, घूमना फिरना, लड़ाई झगडा, मार पीट, ऐसे पंगों का मौका कम मिलता है बेचारों को,12 th कर के निकले तो इंजीनियरिंग कॉलेज का बोझ लद गया बेचारे पर, वहां से निकले तो MBA और अभी पढ़ ही रहे थे की मोटी तनख्वाह की नौकरी. अब मोटी तनख्वाह तो बड़ी जिम्मेवारी, यानी बड़े बड़े targets.
कमबख्त ये दुनिया साली, बड़ी कठोर है और ये ज़िदगी, अलग से इम्तहान लेती है. आपकी कॉलेज की डिग्री और मार्कशीट से कोई मतलब नहीं उसे. वहां कितने नंबर लिए कोई फर्क नहीं पड़ता. ये ज़िदगी अपना अलग question paper सेट करती है. और सवाल साले,सब out ऑफ़ syllabus होते हैं, टेढ़े मेढ़े, ऊट पटाँग और रोज़ इम्तहान लेती है. कोई डेट sheet नहीं.
एक बार एक बहुत बड़े स्कूल में हम लोग summer camp ले रहे थे दिल्ली में. Mercedeze और BMW में आते थे बच्चे वहां. तभी एक लड़की, रही होगी यही कोई 7-8 साल की, अचानक जोर जोर से रोने लगी. हम लोग दौड़े, क्या हुआ भैया, देखा तो वो लड़की गिर गयी थी. वहां ज़मीन कुछ गीली थी सो उसके हाथ में ज़रा सी गीली मिटटी लग गयी थी और थोड़ी उसकी frock में भी. सो वो जार जार रो रही थी. खैर हमने उसके हाथ धोये और ये बताया कि कुछ नहीं हुआ बेटा, ये देखो, धुल गयी मिटटी. खैर साहब थोड़ी देर में उसकी माँ आ गयी, high heels पहन के और उसने हमारी बड़ी क्लास लगाई कि आप लोग ठीक से काम नहीं करते हो, लापरवाही करते हो, कैसे गिर गया बच्चा, अगर कुछ हो जाता तो? सचमुच इतना बड़ा हादसा, भगवान् न करे किसी के साथ हो जीवन में.
एक और आँखों देखी घटना है मेरी. कैसे माँ बाप अपने बच्चों को spoil करते हैं. हम लोग एक स्कूल में एक और कैंप लगा रहे थे, बच्चे स्कूल बस से आते थे. ड्राईवर ने जोर से ब्रेक मारी तो एक बच्चा गिर गया और उसके माथे पे हलकी सी चोट लग गयी, यही कोई एक सेन्टीमीटर का हल्का सा कट. अब वो बच्चा जोर जोर से रोने लगा, बस यूँ समझ लीजे, चिंघाड़ चिंघाड़ के, क्योंकि उसने वो खून देख लिया अपने हाथ पे. खैर मामूली सी बात थी, हमने उसे फर्स्ट ऐड दे के बैठा दिया. तभी भैया, यही कोई 10 मिनट बीते होंगे, उस बच्चे के माँ बाप पहुँच गए स्कूल और फिर वहां जो रोआ राट मची. वो बच्चा जितनी जोर से रोता, उसकी माँ उस से ज्यादा जोर से चिंघाड़ती और उसका बाप जोर जोर से चिल्ला रहा था, पागलों की तरह. मेरे बच्चे को सर में चोट लगी है, आप लोग अभी तक हॉस्पिटल ले के नहीं गए? अरे ये तो न्यूरो का केस है सर में चोट लगी है.
मेरा एक दोस्त जो वहां PTI था उसके साथ हम एक स्थानीय neurology के हॉस्पिटल में गए. अब अस्पताल वालों को तो बकरा चाहिए काटने के लिए. वहां पर भी उस लड़के का बाप CT Scan, Plastic surgery न जाने क्या क्या बक रहा था. पर finally उस अस्पताल के doctors ने एक BANDAID लगा के भेज दिया.
एक और किस्सा उसी स्कूल का, एक श्रीमान जी सुबह सुबह आ के लड़ रहे थे, क्या हुआ भैया, स्कूल बस नहीं आयी, हमें आना पड़ा छोड़ने. बाद में पता चला श्रीमान जी का घर स्कूल से बमुश्किल 200 मीटर दूर, उसी कालोनी में तीन सड़क छोड़ के था और लड़का उनका 10 साल का था.
क्या बनाना चाहते हैं आज कल के माँ बाप अपने बच्चों को? ये spoon fed बच्चे जीवन के संघर्षों को कैसे या कितना झेल पाएंगे?
आज से लगभग 15 साल पहले, मेरा बड़ा बेटा 4-5 साल का था, अपने खेत पे जा रहे थे हम. बरसात का season था, धान के खेतों में पानी भरा था. मेरे बेटे ने मुझे कहा, पापा, मुझे गोदी उठा लो. मैंने कहा कुछ नहीं होता बेटा, पैदल चलो और वो चलने लगा और थोड़ी ही देर बाद पानी में गिर गया. कपडे सब कीचड में सन गए. अब वो रोने लगा, मैंने फिर कहा कुछ नहीं हुआ बेटा, उठो, वो वहीं बैठा बैठा रो रहा था. उसने मेरी तरफ हाथ बढाए, मैंने कहा अरे पहले उठो तो और वो उठ खड़ा हुआ. मैंने उसे सिर्फ अपनी ऊँगली थमाई और वो उसे पकड़ के ऊपर आ गया. हम फिर चल पड़े. थोड़ी देर बाद वो फिर गिर गया, पर अबकी बार उसकी प्रतिक्रिया बिलकुल अलग थी. उसने सिर्फ इतना ही कहा, अर्रे... और हम सब हंस दिए. वो भी हंसने लगा और फिर अपने आप उठा और ऊपर आ गया. मुझे याद है उस साल हम दोनों बाप बेटा बीसों बार उस खेत पे गए होंगे, वो उसके बाद वहां से आते जाते कभी नहीं गिरा.
कल मैं नीरज जाट जी की करेरी झील की trekking वाली पोस्ट पढ़ रहा था. 4 दिन उस सुनसान बियाबान में, जिसका रास्ता तक नहीं पता, इतनी बारिश और ओला वृष्टि में, ऊपर से ले कर नीचे तक भीगे, भूखे प्यासे, न रहने का ठिकाना न सोने का. उस कीचड भरे मंदिर के कमरे में, उस बिना chain वाले स्लीपिंग बैग में रात बिता के भी, कितने खुश थे. इतना संघर्ष शील आदमी, क्या जीवन में कभी हार मानेगा?
काश कार्तिक राजाराम, जी हाँ यही नाम था उस लड़के का. उसे भी बचपन में गिरने की, गिर गिर के उठने की, बार बार हारने की और हार के बार बार जीतने की ट्रेनिंग मिली होती.
कठोपनिषद में एक मंत्र है, उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत. उठो जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक आगे बढ़ते रहो. शुरू से ही अपने बच्चों को इतना कोमल, इतना सुकुमार मत बनाइये कि वो इस ज़ालिम दुनिया के झटके बर्दाश्त न कर सके.
एक अंग्रेजी उपन्यास में एक किस्सा पढ़ा था. एक मेमना अपनी माँ से दूर निकल गया. आगे जा कर पहले तो भैंसों के झुण्ड से घिर गया. उनके पैरों तले कुचले जाने से बचा किसी तरह. अभी थोडा ही आगे बढ़ा था कि एक सियार उसकी तरफ झपटा. किसी तरह झाड़ियों में घुस के जान बचाई तो सामने से भेड़िये आते दिखे. बहुत देर वहीं झाड़ियों में दुबका रहा, किसी तरह माँ के पास वापस पहुंचा तो बोला, माँ, वहां तो बहुत खतरनाक जंगल है. Mom, there is a jungle out there.
इस खतरनाक जंगल में जिंदा बचे रहने की ट्रेनिंग अभी से अपने बच्चों को दीजिये.।

02/06/2018

मैने कभी नही सुना कि अमेरिका में बोर्ड इग्जाम के रिजल्ट आ रहे हैं या यूके में लड़कीयो ने बाजी मार ली है या आस्ट्रेलिया में किसी छात्र के 99.5 % आऐ है।

मई-जून के महीने में हिंदुस्तान के हर घर में दस्तक देती है एक भय एक उत्तेजना, एक जिज्ञासा, एक मानसिक विकृति... हर माता-पिता, हर बोर्ड के इग्जाम मे बैठा बच्चा हर बीतते हुए पल को एक ओबसेसन एक डिप्रेशन एक इनसेक्योरीटी में काट रहा होता है .. कि क्या होगा ?

माता-पिता फ़सल की तरह बच्चो को पाल रहे है कि कब फ़सल पके कब उनकी अधूरी रह चुकी अकाँक्षाऐ पूरी होंगी, कब वे फ़सल काटेंगे।

हमारे पूंजीवादी इनवेस्टर्स को क्या प्रोडक्ट चाहिये इस हिसाब से शिक्षा और उसके उद्देश्य तय हो रहे हैं। एक परिवार सुख-चैन त्याग, दिन-रात खट के, सँघर्षो, घोर परीश्रम में गुज़र जाता है उस परीवार का अपना अस्तित्व और सुख चैन और मानवीय भावनाऐ इसलिये भेंट चढ जाती है क्योंकि टीसीएस को एक बेहतरीन सोफ्टवेयर डेवलेपर चाहिये.. या मेकेन्से को बेस्ट ब्रेन चाहिये.. या रिलायन्स को बेहतरीन गेम डिजाइननर चाहिये।

हमारी शिक्षा व्यवस्था व उसके आदर्श कहाँ रह गये ?

हमारे स्कूल देश के बेस्ट नागरिक नही देश के बेस्ट मजदूर बनाने में दिन रात एक करके जुटे हुए हैं.. और माता-पिता बच्चो को बच्चा नही, एक मेकेनिकल डीवाईस बनाने को प्रतिज्ञाबद्ध हैं।

बच्चो को जीने दो.. दुनिया खत्म नही होने जा रही... उन्हे बेस्ट इम्प्लोई नही बेस्ट सीटीजन बनाने में यकीन रखो दोस्तो ..

बचपन की भी खुद से कुछ अपेक्षाऐ होती हैं अपने निस्वार्थ स्वप्न होते हैं उनका हमारे लिये कोई अर्थ नही पर.. बच्चो के लिये वो जन्नत से कम नही .. प्लीज बच्चो की दुनिया मत उजाड़ो .. उन्हे मनोरोगी मत बनाओ ...

ये एक मानसिक रुग्णता ही तो है ..टोपर्स की खबरें.. उन्हे मिठाई खिलाते माता-पिता की फोटो .. क्या ये एक आम सामान्य स्तर के बच्चो को मानसिक हीनता की अनुभूती नही देंगे ??

अरे..टापर तो दो चार होंगे बाकी देश का बोझ तो 99% इन्ही फूल से कोमल सामान्य बच्चो ने ही उठाना है. उनकी मुस्कान मत छीनो .. देश से उसकी सृजनात्मक शक्ति मत छिनो ..

जैसे हमारे लिये नेपाल के माँ बाप मजदूर तैयार कर रहे हैं वैसे ही हम टाटा, रिलायंस, एल एंड टी, मारुति, मेकेन्से, देन्सू , etc के लिये मजदूर तैयार कर रहे हैं।

वे कुछ भी बन जाएं .. एमएनसी में सीईओ हो जाएं पर जो बचपन की रिक्तता हमने आरोपित कर दी है वो उन्हे जीवन भर खलेगी और मानवीय विकृतियों के रुप में फलेगी ... हमको बेस्ट सीईओ मिलेंगे जिनकी प्राथमिकता उनकी कंपनी होगी , देश और परिवार नहींं
साभार(Dr. Bharti Kaushik)

23/05/2018

"पिंटू कहाँ है ?"
"खाना खा रहा है "
"8 बजे तो खाना खा रहा था मेरे साथ मेस में "
" जानते हो भुक्कड़ है, 9:30 बजे फिर भूखा हो गया"
" 10:30 की ट्रैन है, कब निकलेंगे "
"10:10 पे बाबा बाइक से छोड़ देगा"
"सालों, ५ लोग एक बाइक से कैसे जाएंगे और 2 ही बर्थ है कन्फर्म, 1 की RAC है, १ गधे की वेटिंग है और एक साला रेलवे की औलाद, खुद फ्री में आ रहा है और अपनी छमिया को बोला है की तुमको भी adjust कर लेंगे"
"हम जाते ही सो जाएंगे, उठेंगे ही नहीं जब तक गाडी पनकी स्टेशन नहीं पहुँचती"
" बिहारी को बोल दो , हम Capstan सिगरेट नहीं पीते, बड़ी गोल्डफ्लेके रख लेगा, बाथरूम में पी लेंगे, कंजर आदमी है "
" आशु को पूछ लेना पत्ते रखा है की नहीं, माता का जगराता है आज, दहला पकड़ खेलेंगे "
" Old Monk रख लिए हैं हम"
" अबे घोड़े हो क्या, इतनी गर्मी में old monk पिएंगे "
"तुम न पीना, ज़बरदस्ती थोड़े है"
"ठीक है, रख लिए हो तो पी लेंगे"
" देखो ज़रा पिंटू का खाना हुआ की नहीं, मेस workers का खाना भी खा के उठेगा ये अब"
" जल्दी चलो बे, PNR में देखना होता है की कौन सी लड़की किस बोगी में अकेले travel कर रही है"
" अबे अब रेलवे ने चार्ट लगाना बंद कर दिया है, तुम्हारे ठरकी पने के वजह से "
" बड़ा नुकसान हो गया बे"
" हाँ तुम तो तोह DDLJ के हीरो हो न, सिमरन ढूंढ़ ही लेते "
" अच्छा सुनो, हम upper बर्थ में सोयेंगे, Tundla स्टेशन में जगा देना, छोले-भठूरे खाने हैं"
" साला अभी हौंक के आया है और फिर खाने की चिंता, आदमी हो या राक्षस, ईंट -मौरंग खाना शुरू करो तुम अब, वो भी पचा लोगे तुम पिंटू "
"अख़बार रखे हो ?"
" अख़बार लगवाया ही नहीं है, पिछले सेमेस्टर की Thermodynamics की किताब रख लिए हैं, पेज फाड़ के रख लेना नीचे, syllabus बदल गया है तो अब बिक भी नहीं रही है"
" पता नहीं कहाँ से भूखे नंगे आ गए हैं, कोई और कॉलेज नहीं मिला था काउंसलिंग में तुम सालों को "
" तुम्ही IIT चले जाते, कानपूर के कानपूर में रहते, लेकिन उखड़ा तुमसे कुछ, जनरल में तो डेढ़ लाख रैंक आयी थी "
" चलो अच्छा मुँह न लगो, निकलो जल्दी "
" यही दिन देखना बचा है की तुमसे मुँह लगे"
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मोबाइल की घंटी बजी और नींद खुल गयी

एयरपोर्ट के lounge में बैठा हू, सामने लैपटॉप खुला है, Powerpoint में कुछ चार्ट बना है, सामने orange जूस और एक थाली में कुछ high figh सा नाश्ता है, जो घर में नहीं खाता हु वो एयरपोर्ट के lounge में क्रेडिट कार्ड से खा लेता हू।

अकेला बैठा हू , चारों ओर सब अजनबी हैं, सिगरेट छोड़ दी है, दारु कम कर दी है। अब तो छींक भी इंग्लिश में आती है और ऐसी फर्राटेदार इंग्लिश में client presentation देता हु की client सन्न रह जाता है ।

मोबाइल में एक इंजीनियरिंग वाला whatsapp ग्रुप है जिसमे जोक्स आते रहते हैं। touch में हैं लेकिन सबकी ज़िंदगी में इतना सब कुछ बदल गया है की कोई कहानी सुना ही नहीं सकते , सबकी कहानियों में किरदार बदले हुए हैं। बस पूछ लेते हैं "कैसे हो?" और सब कह देते हैं "ठीक हैं"

boarding शुरू होने का time हो गया है और हमारा confirm टिकट है, window सीट का। ट्रैन में तो window सीट (lower बर्थ ) मिलती नहीं थी, यहीं शौक पूरा कर लेते हैं।

जब वहां था तब ऐसी ज़िंदगी चाहता था, आज यहाँ हू, तो वो ज़िंदगी बहुत मिस करता हू |

कहानी में आप जहाँ पर भी हो , जी लो, ये one -way ट्रैन है, वापिस नहीं आएगी और चढ़ना तो पड़ेगा ही क्यूंकि इस ट्रैन का नाम है 'वक्त' |
Post Credit - आप uptu पीड़ित हैं ।

Congratulations.....BIETians....
23/05/2018

Congratulations.....BIETians....

06/05/2018

'पढ़ाई इस के बस की नहीं'
"बंड है आपका बेटा! पढ़ाई वढाई इससे नहीं हो पायेगी।"
12 वीं पास की थी मैंने उस समय। AIEEE के एग्ज़ाम में 75000 रैंक लगी थी। 12 लाख लोगों में वैसे तो सही थी, पर इसमें जनरल वाले को कोई NIT नहीं मिलती थी। तो घूम फिर कर प्राइवेट कॉलेज का ही ऑप्शन बचता था।
कम रैंक लगते ही समस्त परिवार वाले शोक-संवेदना प्रकट करने आने लग गये थे। सब के सब भावना प्रकट करने के बहाने से आते और 200 रूपये का नाश्ता डकार जाते। कई अपने दूर के रिश्ते के किसी बच्चे की अच्छे कॉलेज में दाखिले से लेकर MNC तक पहुँचने की कहानी सुनाकर जाते। इस से और दिल जल उठता था।
मेरे पापाजी किसी कातिल सजायाफ्ता मुजरिम के बाप की तरह सर झुकाये सब की लानतें सुनते रहे। पाप ही तो किया था उनके बेटे ने! 2 लाख रुपया कोचिंग में लगवाने के बावजूद गवर्नमेंट कॉलेज में नहीं जा पाया! सब ने सब कुछ बोला पर मेरी किसी ने नहीं सुनी।
10वीं पास कर होश संभाले नहीं थे कि मुझे ज़बरदस्ती कोटा भेज दिया गया। ऐसी जगह जो कालापानी से कम नहीं थी। रेगिस्तानी गर्मी और लालच से भरे लोग। इन सब के बीच मुझे 2 साल के लिये पटक दिया। और नामी कोचिंग में भर्ती करा दिया।
सुबह भेड़ों की तरह कोचिंग जाना और दिन भर माथा फुडा शाम को आना, फिर यहाँ के मैसों का कचरे जैसा खाना। कोचिंग में देखो तो मास्टरों से डाउट क्लियर करने को बच्चे ऐसे लालायित जैसे अगला मंगलयान यहीं से बनेगा। सब कुछ अजीब अटपटा सा लगता था। वो अलग ही बन्दे थे जो सिलेक्शन निकाल लेते थे, मैं शायद उनमें से नहीं था।
अपना पूरा जोर लगाया, पर आखिर रिजल्ट नहीं निकाल पाया।
रिश्तेदार तो पकोड़े की दुकान लगवा ही देते, पर पापाजी ने जीवन में एक बार मुझे अपने दिल का करने की स्वतंत्रता दी।
कहानी कहने का शौक रहा था, तो उसी के बेस पर फिल्ममेकिंग की पढ़ाई करने चला गया। अब कुछ भी अटपटा सा नहीं लगता था। फीस भी इतनी कम थी कि फेल भी हो जाओ, तो पैसे का गम तो ना रहे। जम के पढ़ा और फिर बम्बई में 4 साल जम के स्ट्रगल किया।
आज फिल्मों का स्क्रीनप्ले लिखता हूँ। असिस्टेंट डायरेक्टर का काम भी देखता हूँ।जिसकी ज़िन्दगी का स्क्रीनप्ले लिखने कभी रिश्तेदार आये थे, आज वो दुनिया को अपनी फिल्में दिखाता है।
कुछ IITian मित्रों से कभी बात होती रहती है। सब लगभग 20 लाख के पैकेज वाले हैं। पर खुश कोई नहीं रहता। एक दोस्त कहता है कि उसे ऑफिस से लौटने के बाद डेली गांजा चाहिये। कोडिंग कर कर के पूरे दिन की फ़्रस्टेशन गांजे से ही निकलती है। दूसरा दोस्त ट्रम्प के आने से दुखी है क्योंकि उसका वीसा रुक गया है एक साल से।
तो कुल मिलाकर बचपन में जो सीखा था कि जितना ज़्यादा पैसा कमाओगे, उतना सुख में रहोगे, वो तो मैंने गलत प्रमाणित होते देख लिया।
पर मेरी ज़िन्दगी आप लोगों की दुआ से शान्ति में है। सुख के समय पागल नहीं होता और दुःख के समय व्याकुल नहीं होता। हर समस्या का ठन्डे दिमाग से चिंतन करने पर हल दिख ही जाता है। और जब हल नहीं मिलता तो भगवतगीता पढ़ने बैठ जाता हूँ। ज़्यादातर लोग इसे धर्म के लिये पढ़ते हैं, मैं इसे बस उलझे हुए रास्ते खोजने को पढ़ता हूँ। जहाँ से मुझे दिखना बंद हो जाता है, वहाँ पर ये किताब आँखों का काम करती हैं।
The Rejected Writer
~जय

बीआईईटी की ये हमेशा से समस्या रही है । माननीय मुख्यमंत्री   MYogiAdityanath जी कृपया इस समस्या पर भी अपने मंत्री जी का ध...
06/05/2018

बीआईईटी की ये हमेशा से समस्या रही है । माननीय मुख्यमंत्री MYogiAdityanath जी कृपया इस समस्या पर भी अपने मंत्री जी का ध्यान आकृष्ट करें ।

10/04/2018

USA produces around 1 lakh Engineers per year for a $ 16 Trillion Economy.

India produces 15 lakhs Engineers for a $ 2 Trillion Economy.

The earlier mass recruiting sector was Manufacturing. It used to recruit from the core branches like Electrical Mechanical, Civil etc. But, Manufacturing is relatively stagnant at 17% of the GDP. So the core branch placements have become very difficult.

The more recent mass recruiter was the IT sector. It grew from scratch to almost 5% of the GDP in a short time. IT Employed millions of engineers.

Now, IT is also saturating. Only good, skilled IT Engineers are in demand.

If you look at the sectoral composition of Indian economy, most of the sectors do not need engineers. Tourism is 10% of the GDP, does not require engineers. Financial sector, Trade, Hotels and Restaurants do not require engineers. Requirement of engineers in Health, education, Agriculture is also negligible.

More than 50% of the GDP has no role for Engineers. Still most of Indian youth are becoming Engineers. The situation is not sustainable .

Demand is low while supply is high. Over and above this, skill level of an average engineer is poor, almost its non-existent in many cases. If we leave aside the top 100–200 colleges, most fresh engineers have no idea of what they studied. Ask a fresh mechanical engineer, can s/he design a simple frame?

Today the situation is that most engineers are working in a field that has no connection to what they have studied in the college. This is a waste of resources.

Engineering degree does not come cheap. It costs about 10-15 lakhs. For poor parents, its a huge burden. When their son / daughter is not able to secure a job, they are devastated.

For the nation, you can calculate the loss. Leave around 1 lakh engineers that NASSCOM says are employable. The rest 14 lakhs have each wasted 10 lakhs of fees. That totals to around $ 20 Billion. Almost equal to the Government’s spending on healthcare. Over this, there is loss of human capital.

We need to replan the whole engineering education system. Cut down on the number of colleges and improve the quality in the rest.

Also students should explore other career options than everyone becoming Engineers.

So, share this to your relatives/parents/12th pass students and help them in planning their education appropriately.

09/04/2018

#पराठे_खिला_दो

आलू के पराठे पराठो की दुनिया के सुपरस्टार होते हैं...अमिताभ होते हैं.... मोदी होते हैं...शाहरुख़ खान होते हैं.... जिसने आलू के पराठे ठुकरा दिए या तो वो बेवकूफ होगा..या वेकबूफ होगा...अर्थात कुछ नहीं होगा...लेकिन पराठे मौका देते हैं... किसी को मिलने बुलाने का... किसी से मिलने जाने का... बर्गर पिज़्ज़ा की जगह पराठे खिलाने का... किसी से "पिज़्ज़ा खिला दो" की जगह "पराठा खिला दो" नहीं बोला तो सब व्यर्थ हैं

पराठे पराकाष्ठा हैं... आसक्ति की... और विरक्ति की... मोह की ...और विमोह की...श्रृंगार और वियोग की... परांठे सुख भी हैं और दुःख भी हैं...सन्नाटा भी और कलरव भी...जो जैसा चाहता हैं आलू का पराठा वैसा ही ढल जाता हैं....बिना लाग लपेट के... उसने स्ट्रगल किया हैं "आलू का पराठा" बनने में... धूल से फूल बनने में... सब आलू का पराठा ही चाहते हैं... लेकिन आलू के पराठे को क्या चाहिए ये किसी को नहीं पता...

पराठे को साथ चाहिए... आप चाहे गुड़ हो..चाहे चटनी...चाहे दही..या फिर टोमेटो चिली सॉस ही हो... पराठा आपसे मिल जाएगा ...जो जैसा होता हैं आलू का पराठा वैसा ही ढल जाता हैं...उसे भी पता होता हैं वो सुपरस्टार हैं...जो उसे खाएगा वो तो खाएगा... जो नहीं खाएगा उसका जीवन व्यर्थ जाएगा ;)

#देव

26/03/2018

ज़िन्दगी में प्रायोरिटी ही सबकुछ होता है... आज जो तुम्हारी प्रायोरिटी लिस्ट में सबसे ऊपर है उसकी स्माइली का भी तुम रिप्लाई देते फिरोगे.. और जो सबसे नीचे है उसके लंबे पैराग्राफ जैसे मेसज को भी पढ़ के छोड़ दोगे...

आज तुम जिसकी प्रायोरिटी होंगे कल को उसकी लिस्ट में नीचे होगे...आज कोई तुम्हारी स्माइली का जवाब देता होगा कल को नहीं देगा... यही सत्य हैं बाकी सब मिथ्या 😎

#दे_रहे_न_स्माइली_का_भी_जवाब 😂

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