07/01/2026
लो चले ,
बीते वक्त की ओर,
जहां न कोई फिक्र,
न कोई झोल /
बस चारों ओर,
धूम धड़का /
मस्ती का माहौल //
वो काटो की ,
तारों वाला खुला मैदान ,
जहां खेलते,
बड़े हुए हम नादान /
कभी गुल्ली डंडा,
कभी पकड़न पकड़ाई,
किसी कोने में छिप कर बैठे,
खेलते छिपन छिपाई,//
पीठ छिल जाती,
घुटने जिस जाते /
चप्पल का तो पता नहीं,
हाथ पैर धूल से सन जाते ,
क्रिकेट के मैदान में
गिटी फोर भी खेल जाते //
बचपन बहुत खूबसूरत,
न लौटे दोबारा,
हम ही बार बार,
उन गलियों में,
घूम आते हर दिन,
दोपहरी दोबारा //
स्वरचित रचना,
रचना बहल,
कानपुर (उ प्र)