__Disclaimer__
ये पेज एक व्यक्तिगत पेज है, शहीद उधम सिंह राजकीय महाविद्यालय कि पुरानी यादों को सहेजने के लिए आप इस पेज पर अपनी फोटों और विडियो अवश्य शेयर करें।
आपकी सहायता के लिए इसमें official महाविद्यालय की संपर्क जानकारी भी प्रदान की गई है जिस पर आप जाकर महाविद्यालय के ऑफ़िस में संपर्क कर सकते हैं ।
धन्यवाद।
CONTACT INFORMATION
Principal, Shaheed Udham Singh Govt. College, Indergarh Road, Mat
ak Majri Indri(Karnal) PinCode 132041
01842382469
[email protected]
This college was started in 1997 in the name of the great martyr Shaheed Udham Singh to cater to the increasing demand of education of this region in this age of development and technology. As a result of continuous hard work and prolonged efforts of the people belonging to the local region this college was taken owner by the Govt. of Haryana on 17th May 2005 and was known as Shaheed Udham Singh Govt. College thereafter. This college in contiguously moving towards the path of success since its inception and has completed 15 Years of its academic achievements. Despite limited number of available resources, this college has proved itself as an ideal institution for its students. There are faculty of Arts, Commerce besides B.C.A and B.Sc (Non-Med. And Computer Science) catering to the needs of both boys and girls of local region. Various subjects like Hindi, English, Economics, Pol .Science, History, Music, Geography, Psychology and Math’s are being taught here under Arts faculty. The aim of this college is over all development of personality of students along with their mental and academic growth so as to enable them to lead a successful life ahead. The students are motivated to decide their career keeping in view their individual talent and particular interests. Affiliated to KUK, this college is situated in a lush green environment far from the madding crowd of cities on the Matak Majri, Indergarh Road surrounded by natural greenery. There are neat and clean lecture rooms, smart laboratories and computer labs too which are well equipped for study purpose of students. There is also on arrangement for imparting education through Edu Sat. Three computer labs are there to impart Computer Education to students based on latest technology. The college also boasts of a large play ground, Gymnasium Hall and is having all equipments related to the same. Thus, this college is well equipped in all respects and is moving ahead continuously towards the mental and physical growth of students which is the demand of present times.
मरने के लिए बूढ़े होने का इंतजार क्यों करना? मैं देश के लिए अपनी जान दे रहा हूं...", आज से 69 साल पहले भारत मां के वीर पुत्र ने फांसी पर चढ़ने से अपने देशवासियों के नाम यह चिट्ठी लिखी थी। 13 अप्रैल, 1919 को पंजाब के जलियांवाला बाग में रॉलेट एक्ट का विरोध कर रहे हजारों निर्दोष भारतीयों को जब अंग्रेज गोलियों से भून रहे थे, तो एक सरदार ने अपनी मिट्टी से वादा किया था कि वो इस नरसंहार का बदला लेकर रहेगा।
अपने वादे को पूरा करने के लिए भारत मां का यह लाल 21 सालों तक बदले की आग में जलता रहा और आखिरकार 13 मार्च, 1940 को लंदन में माइकल ओ ड्वायर को मौत के घाट उतार कर अपनी कसम पूरी की। माइकल ओ ड्वायर जलियांवाला कांड के वक्त पंजाब प्रांत के गवर्नर थे।
यह वीर देशभक्त जिन्हें पूरा देश सरदार उधम सिंह के नाम से जानता है, उनका असली नाम था शेर सिंह। 13 मार्च को उधम सुबह से ही अपनी योजना को अंजाम देने के लिए पूरी तरह तैयार थे। माइकल ओ ड्वायर को एक सभा में हिस्सा लेने के लिए तीन बजे लंदन के कैक्सटन हॉल में जाना था। उधम वहां समय से पहुंच गए। वो अपने साथ एक किताब ले कर गए थे, जिसके पन्नों को काट कर उन्होंने बंदूक रखने की जगह बनाई थी। उन्होंने धैर्य के साथ सभी के भाषण खत्म होने का इंतजार किया और आखिर में मौका पाते ही किताब से बंदूक निकाल कर ड्वायर के सीने में धड़ाधड़ गोलियां दाग दीं। ड्वायर को दो गोलियां लगीं और मौके पर ही उनकी मौत हो गई।
ड्वायर की तत्काल मौत हो गई। इस दौरान तीन अन्य अधिकारी भी घायल हो गए, जिनमें भारत के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट भी शामिल थे। उधम सिंह का 21 साल लंबा इंतजार पल भर में खत्म हो गया, लेकन अभी उन्हें अपने साहस की सजा मिलनी बाकी थी। उन्हें तुरंत पकड़ कर हिरासत में ले लिया गया।
उधम सिंह का असली नाम कुछ और था
उधम सिंह ने खुलेआम अपना गुनाह कबूल करते हुए लिखा कि,'मैंने उसे मारा क्योंकि मुझे उससे नफरत थी। वो इसी लायक था। मैं किसी समाज का नहीं। मैं किसी के साथ नहीं। मरने के लिए बूढ़े होने का इंतजार क्यों करना? मैं देश के लिए अपनी जान दे रहा हूं।' केवल दो महीने चले मुकदमे के बाद 31 जुलाई, 1940 को उन्हें पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई।
उन दिनों उधम सिंह का नाम शेर सिंह हुआ करता था। 26 दिसंबर, 1899 को पंजाब के संगरूर गांव में उनका जन्म हुआ था। छोटी सी उम्र में ही माता पिता के निधन के बाद वो अनाथालय में पले-बढ़े। उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की थी जब जालियांवाला के दर्दनाक कांड ने उनके जीवन को आजादी की लड़ाई की तरफ मोड़ दिया।
वो 'गदर' पार्टी से जुड़े और बाद में बड़े नेता के तौर पर उभरे। इसी बीच उन्हें 5 साल की जेल की सजा हुई थी। सजा काटने के दौरान लाहौर जेल में उनकी मुलाकात भगत सिंह से हुई, जिनसे वो बहुत प्रभावित हुए थे। जेल से निकलने के बाद उन्होंने अपना नाम बदल कर 'उधम सिंह' रखा और पासपोर्ट बनाकर विदेश चले गए।
भेष बदल कर लंदन में रहते थे उधम सिंह
sardar udham singh
उधम सिंह अपने मिशन को अंजाम देने के लिए इतने समर्पित थे कि वे कई साल तक भेष बदल कर विदेश में रहे। इस दौरान एक तरफ दूसरे विश्व युद्ध का खतरा मंडरा रहा था और दूसरी तरफ उधम साउथैंपटन में सिंह आजाद के नाम से रह रहे थे। यहां वो सेना के लिए कैंप बनाने वाली कंपनी में काम करते थे।
उधम सिंह ने एलिफेंट बॉय और द फोर फेदर्स नाम की दो ब्रिटिश फिल्मों में भी काम किया, लेकिन किसी की मजाल नहीं थी कि उन्हें पहचान पाता। वहां अंग्रेजों की ज्यादती का विरोध करने के कारण वो पुलिस की नजरों में तो आ गए, लेकिन कभी किसी के हाथ नहीं आए। उनके पीछे ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी भी लगी हुई थी, लेकिन कोई उन्हें खोज नहीं पाया।
13 अप्रैल को मिशन पर निकलने से पहले उधम अपने मित्र और पिता समान बंदा सिंह से मिले थे। उधम ने भावुक हो कर अपने मित्र से कहा था कि भाई जी अपना सामान बांध लो और ये शहर छोड़ दो। मैं कुछ करने वाला हूं। मैं नहीं चाहता कि बाद में जो कुछ हो उसमें आप पकड़े जाओ।
बांदा सिंह मना करने पर उधम ने कहा "उसे मरना ही होगा और मुझे ही ये करना है"... इतना कह कर उधम सिंह ने अपनी आखिरी मुलाकात पूरी की और चल पड़े।