04/12/2020
मैं मुर्दो का शहर हुं,मेरा नाम है कोटपूतली
मैं मुर्दो का शहर कोटपूतली हुं,मेरी कहानी ठीक वैसी ही है जैसी किसी श्मशान,कब्रिस्तान की होती है,जगह-जगह झाडिया,गंदगी,कुडा करकट और मुर्दो लोग यही मेरे हिस्से में आतें है।श्मशान और कब्रिस्तान को मुक्ति का द्वार भी माना जा है। मैं भी मुक्ति का द्वार हुं,लेकिन उन लोगो के लिए जो यहां उंचे पदो पर आसीन है या फिर उन लोगो के लिए जिनके तन पर खादी है।लाचार,मजदूर,गरीब लोगो के लिए मेरे पास कोई रास्ता नही है क्यांेकी ये लोग पैदा ही मुर्दा होतें है। इनके पास बोलने के लिए शायद जिव्हा नही होती है।
अब आप सोच रहें होगें की मै अपनी ही आलोचना क्यों कर रहा हुं।आपका सोचना भी उचित है।लेकिन मेरी भी मजबुरी है क्योकी आजादी से लेकर आज तक ना तो मै प्रशंसा के काबिल बन पाया और नाही आलोचना के। लोगो आये जेबें भरी और अपना रास्ता नाप लिया। मै वही का वही रहा।हां बीच में एक भले बाबा आये थे जिन्होने मेरी सुध ली।दो चार विकास की ईमारते खडी करवा दी,बाबा चले गयें ईमारतें वही की वही है। यहां के सफेद खादीधारी लोगो में एक अच्छी बात ये लोगो मुश्किल वक्त मंे मिल बांट कर खाते है।ताजा उदाहरण तो अपने देखा ही होगा।मेरे विकास में सबसे बडें बाधक वो अर्ध चेतन लोग भी है जो केवल चुनाव के समय नजर आतें है और बाद में गायब हो जातें है।ना यहां सही का समर्थन होता है और नाही गलत का बहिष्कार। सदैव एक जैसी परिस्थियों में रहता हुं जो मुर्दो की पहचान है।कही से उठा के कही पटक दो एक ही बात है।
लेकिन मै कुछ लोगो को ढुंढ रहा हुं जिन्हें देखकर मुझे लगा था शायद इनमें जान है।
एक वो जो नगरपालिका के बाहर बैठकर भष्टाचार की दुहाई देते थे।
दुसरे वो जो मौत का अड्डा बन चुके बानसुर कट पर पुलिया निर्माण की मांग कर रहें थें
तीसरे वो जिनकी तस्वीर धुधली सी याद आती है,हां पर वो जिला बनाने की मांग कर रहें थें
आशा करता हुं ये सभी लोग खैरियत से होगें,उपर वाला मेरी तरह इनकी भी हिफाजत करेगा।
दुआओं में याद रखना
आपका अपना कोटपूतली