24/12/2014
गीता के हरि उद्बोधन (जयंती) १८ दिवा पश्चात् पड़ने वाले कलियुग के प्रारंभिक वर्ष के सबसे महत्वपूर्ण मास के प्रथम दिवस को कृष्ण मास या पुरुषोत्तम मास या विष्णु मास कहते हैं कई अर्थों में ये भी एक नववर्ष है. १५०० वर्षों के झंझावात और म्लेच्छों के प्रभाव से हम भारतीय इस महान प्रभावकारी तिथि को सही सम्मान देना भूल गए हैं . निक्रिष्टों के प्रभाव में हमने इसे मल-मास, खलु (बुरा) मास या खरमास बना दिया है. मात्र इसी (और अन्य सामान्य) कारणों से भारतवर्ष या आर्यावर्त समूचे विश्व का शिक्षक, विश्वगुरु एवं शासक बना . महान नायक, विष्णु सदृश्य, "परम भागवत" "साहसांक" चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य के "रामराज्य" में महा ब्राह्मण वराहमिहिर द्वारा स्थापित उस प्रचंड अलौकिक विश्व के इस अनुसन्धान को हम अनार्य प्रभाव में हम विस्मृत कर चुके हैं.
अगर भारतवर्ष या आर्यावर्त को फिर से आर्यावर्त बनना है और "हिन्दू" और "Indus" के आक्षेप से मुक्त होना है तो हमें इसी क्षण और कल से ही कृष्णमास का निर्वहन - पूरे विधिविधान से एवं गंभीर आचरण एवं अनुशासित मनःस्थिति से इसका आयोजन समस्त हिन्दू समाज और वास्तव में समूचे देश में प्रारंभ किया जाना चाहिए.
कृष्ण मास या विष्णुमास, पूर्णमास विद्यालयों और समस्त शिक्षा संस्थानों में मनाना चाहिए. इस दिन अवकाश न होकर जागृत उर्जावान होकर शुद्ध मुद्रा में संयत होना सीखना एवं सिखाना चाहिए.
इस दिन, सभी गुरुओं का सम्मान, शुद्ध, स्थापित एवं सर्वमान्य "ब्राह्मण संस्था" (अगर है तो, जो वास्तव में इस देश में अभी नहीं है *) के प्रस्थापित आचार्यों से संपर्क एवं शिक्षा प्रारंभ करना चाहिए. ईसाइयत में सेंट वास्तव में इसी प्राचीन प्रचलन का पश्चिमी अभिग्रहण है जो प्राचीन आर्य संत यानि ऋषियों यानि गुरुकुल, विश्वविद्यालयों के आचार्यों, महान प्रबुद्धों, शिक्षको एवं ज्ञानियों के लिए प्रयुक्त होता था. इस महान तिथि की उपेक्षा एवं इसे मात्र मंगल कार्यों के अनुपयुक्त पा इससे वैमनस्य ही हमारी दुर्दशा का कारण है.
कृष्ण मास या विष्णु मास या "गुरु-मास" पर प्रातःकाल स्नान-आराधना करके तैयार हों, जितना हो सके एवं निश्चित रूप से केसरिया, पीताम्बर एवं उन सबसे बढ़कर indigo यानि जामुनी, नील श्वेत का मिश्रित रंग वस्त्र रूप में या तिलक रूप में धारण करें .
यही दिवस पठन पाठन, दीक्षारंभ, गुरुकुल स्थापना, शोध एवं शिक्षण सत्र आरंभ, छात्रों को उपाधि वितरण, गुरु दक्षिणा एवं गुरु चरण वंदन हेतु विधिवत प्रस्थापित होना चाहिए और उससे पहले हम अपने जीवन में इसे प्रारंभ कर सकते हैं. किसी अन्य मिथ्या कर्मकांड की आवश्यकता नहीं है.
कृपा करके इस दिन एवं सही रूप में पूरे मास पर्यंत दैहिक, मानसिक (एवं ब्राह्मणों के लिए-(जाति नहीं) आत्मिक भी) अनुशासन का पालन, मद्य, सामिष एवं अन्य वासनाओं से दूर रहें . वास्तव में ईसाई क्रिस्मस इसी मास के पूर्व होने वाला मस्ती पूर्ण या बंदिशों से रहित हर्षोत्सव है. जैसे श्रावण मास से पूर्व "गटारी" मनाया जाता है . अनार्य प्रभाव में हम अपना सत्व निसार चुके हैं .
आज के दिन दान एवं उपहार भी दें, पर पुस्तक का, पाठन सामग्री, शिक्षण उपकरण, शिक्षण सामग्री, गरीब होनहार बच्चों को (खोजकर) शिक्षा के लिए अनुदान, सहायता प्रदान करें जिसके लिए ये सर्व उपयुक्त दिवा एवं माह है.
प्राचीन गुरुओं, महर्षियों, ज्ञानियों, विद्वानों को सम्मानित करें, नमन करें.
विद्यालयों, प्राचीन व्यवस्था के अंतर्गत चलने वाले गुरुकुलों, बटुक संस्थानों, विश्वविद्यालयों, निशुल्क चलने वाले शिक्षण संस्थानों को दान-सहायता के लिए इस माह से महत्वपूर्ण माह और दूसरा नहीं. ऐसा करके हम अपना परलोक सुधारें या नहीं अपने महानतम राष्ट्र का भविष्य अवश्य सुधार देंगे. जिस क्षण सर्वत्र भारतवर्ष इस महान पर्व का शुद्ध विधान से पालन करना आरंभ कर देगा यह राष्ट्र अंश राष्ट्र होने की दिशा में दौड़ पड़ेगा. महामहिम राष्ट्रपति महोदय, आदरणीय प्रधानमंत्री साब से यही अनुरोध है जो उनसे साझा की जा चुकी है.
इस दिन पीपल के वृक्ष की विशेष रूप से या तुलसी या बेल की पूजा की जानी चाहिए ध्यान देने योग्य है ये तीनों पादप क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु, महेश का प्रतिनिधित्व करते हैं, आंग्ल देश में इन पादपों के अभाव में mistletoe यानि अमरबेल या क्रिसमस ट्री को अलंकरण के लिए (नाकी पूजा के लिए) प्रयोग किया जाता है. या पीपल का पत्ता निकाल कर रखना चाहिए खासकर पुस्तक में.
पीली वस्तुओं, आहार का सेवन करना चाहिए, सोंठ, गोंद, हल्दी, केसर, सरसों इत्यादि का सेवन कर सकते हैं.
इस महान देश के भाग्यशाली नागरिकों को गुरु वंदन, ज्ञानोपासना एवं अध्यात्मिक आरोहण के उत्सव कृष्ण मास की नवीन शुभकामनायें, कृपया किसी विदेशी पद्धति एवं म्लेच्छ आस्था का पोषण कल ना करें . यह हमारा हिन्दुओं का ही पर्व है, जीहाँ, "कृष्ण" का इससे गहरा सम्बन्ध है* . तो इससे अभी इसे कृष्ण मास कहें तो भी ठीक, विष्णुमास कहें वो भी ठीक पर इसका आयोजन पुरुषोत्तम आचार से ही करें, वही अत्यावश्यक है.
कृपया सभी हिन्दू एवं अहिंदू भाइयों से साझा करें एवं उन्हें जागरूक करें ...
जय विक्रम, जय सप्तर्षि, जय शिव.
डा. शैलेश.