09/05/2026
23 अप्रैल को महान संत आदि शंकराचार्य जी की जयंती थी।
मात्र 32 साल की उम्र में केदार नाथ धाम, बद्रीनाथ धाम और देश की चार दिशाओं में चार मठ - पूर्व में गोवर्धन मठ , ओडिशा (जगन्नाथ पुरी)
पश्चिम में शारदा मठ द्वारका, गुजरात (द्वारका धाम)
उत्तर में ज्योतिर्मठ बदरिकाश्रम (बद्रीनाथ), उत्तराखंड
तथा
दक्षिण में शृंगेरी शारदा पीठम , कर्नाटक में स्थापित करने के बाद उन्होंने केदारनाथ धाम में ही समाधि ले ली थी।
जिस शताब्दी में उन्होंने सनातन के पुनर्जागरण के लिए सम्पूर्ण देश का भ्रमण किया उस समय भारत में बौद्ध और जैन धर्मों को प्रभाव बेहद ज्यादा हो चुका था।
उन्होंने दोनों धर्मों के जानकारों से शास्त्रार्थ किए और सनातन की कीर्ति को चहुं ओर फैलाया।
"अद्वैत वेदांत" यानी आत्मा ही परमात्मा का रूप है, सनातन को यह दर्शन देने वाले महान संत , "अहं ब्रह्मास्मि" (मैं ही ब्रह्म हूँ) का सूत्र देने वाले आदि गुरु को कोटि-कोटि नमन।