उदय प्रताप कॉलेज परिवार

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उदय प्रताप कॉलेज परिवार This page is dedicated to the old and current students of Udai Pratap college

यह पेज समर्पित है हमारे उदय प्रताप कॉलेज के परिवार के उन लोगो के लिए जिन्होने अपने जीवन के सबसे बेहतरीन साल बिताएँ और अपनी तमाम खट्टी मीठी यादों को सजोएं हुए हैं।
तो आइए आपका स्वागत है, आइए और हमसे और सबसे शेयर कीजिए अपनी सारी यादें।

बहुत बहुत बधाई हो भईया  ....गर्व की बात है हम लोगों के लिए
18/09/2025

बहुत बहुत बधाई हो भईया ....गर्व की बात है हम लोगों के लिए

07/11/2024

सभी राजर्षी मानस पुत्रों को मेरा नमस्कार,
अभी सोशल मीडिया पर उदय प्रताप कॉलेज को बचाने के लिए सतपाल भैया ने एक बहुत ही अच्छी नीयत से संघर्ष का आह्वान किया है, जिसका भरपूर समर्थन राजर्षी मानस पुत्रों द्वारा किया जा रहा है/ सभी बड़े व छोटे भाइयों के विचार को पढ़ के और देख के यह मालूम होता है कि कॉलेज में भ्रष्टाचार ही एक मात्र समस्या है जिसका हल हमें ढूंढना है|
पर मेरी यह व्यक्तिगत सोच है कि समस्याये और भी है.
१. इंटर कालेज में इंग्लिश मीडियम से पढ़ाई का ना होना
2. समय के साथ पाठ्यक्रम में उचित बदलाव का न होना
3. कॉलेज प्रबंधन का दूरदर्शी निर्णय ना लेना
4. कॉलेज में समय के अनुसार शैक्षणिक और खेल की सुविधाओं में वृद्धि का न होना••इत्यादि
अगर हम केवल भ्रष्टाचार को ही सोशल मीडिया पर मुख्य मुद्दा बनाएंगे तो मेरे हिसाब से कॉलेज का कहीं और भी नुकसान न हो जाय, अधिकतर हमारे गुरुजन पढ़ाने के लिए अपना सर्वस्व देते हैं, केवल भ्रष्टाचार का मुद्दा रखने से समाज में उनकी छवी खराब हो सकती है, अभिभावक जो अपने बच्चों को पढ़ने के लिए भेजना चाह रहे होंगे उन्हें निर्णय लेने में कठिनाई होगी, जो बच्चे इस कालेज से पढ़ने के बाद नौकरी की तलाश में होंगे उन्हें भी दिक्कतें आ सकती हैं |मुझे यह देख कर आश्चर्य हो रहा है कि जो राजर्षी मानस पुत्र शिक्षा और शोध के क्षेत्र में हैं उनकी तरफ से कोई सुझाव नहीं आ रहा,अतः मेरा यह व्यक्तिगत सुझाव है कि
1 सबके सहयोग से कॉलेज की समस्याओं को चिन्हित किया जाए
2 उसके समाधान के लिए प्रयास किया जाय
3 यदि भ्रष्टाचार की वजह से कुछ सुविधाएं नहीं जुड़ पा रही हो तो उसका पुरजोर विरोध किया जाय
4 गुरुजनों और छात्रों से मिलकर समस्याएं और उनका समाधान ढूंढा जाय
5 और अगर सबकी जड़ में भ्रष्टाचार ही मिले तो उसे जड़ से उखाड़ फेंका जाय
और इसके लिए हम सभी राजर्षी मानस पुत्रों को @सतपाल भैया के हाथों को अपने सहयोग और समर्थन से मजबूत करना है।
जय राजर्षी

03/09/2024
03/09/2024

आप सभी को भिनगा नरेश राजर्षि उदय प्रताप सिंह जुदेव जयंती की हार्दिक शुभकामनाएँ। इस अवसर पर ईश्वर से कामना है कि आप सभी राजर्षि के बगिया के फूल विश्व के कोने कोने में पुष्पित होकर हम सबका मान बढ़ाएँ।

16/11/2023

अपने पुराने शैक्षणिक संस्थान में जाना है. उदय प्रताप कॉलेज (बनारस) में. इस कॉलेज के पूर्ववर्ती छात्रों का समागम है. 14 नवंबर को. यह कॉलेज यूपी कॉलेज के नाम से प्रसिद्ध है. यहां हमने इंटर (11वीं और 12वीं) की पढ़ाई की. पांच साल पहले (सितंबर, 2018) भी यहां जाना हुआ था. इस कॉलेज के संस्थापक पूज्य राजर्षि उदय प्रताप सिंह की 168वीं जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में. इस कॉलेज के संस्थापक श्रद्धेय उदय प्रताप सिंह को लोक सम्मान के साथ राजर्षि की उपाधि मिली है. वह भिनगा नरेश थे, पर अपने कामों से वह राजर्षि कहलाये.

इस कॉलेज परिसर की स्मृति आते ही लगभग पांच दशकों से अधिक समय पहले यहां गुजारे दो वर्ष (जुलाई 1970-जुलाई 1971) की यादें जीवंत हो उठती हैं. कॉलेज के संस्थापक राजर्षि के प्रति मन श्रद्धा से अभिभूत हो जाता है.

सिताबदियारा गांव (गंगा और घाघरा, दो नदियों के बीच दियारा में अवस्थित) से निकलकर पहली बार कहीं अजनबी जगह पर ठिकाना बना, तो वह यूपी कॉलेज का परिसर ही था. गांव में ही आरंभिक पढ़ाई हुई. प्राथमिक, माध्यमिक और हाई स्कूल तक. मैट्रिक में अच्छे अंक आये. स्कूल के अध्यापकों ने मेरे किसान पिता को सुझाव दिया कि पढ़ने के लिए इन्हें उत्तरप्रदेश भेजा जाए. यूपी कॉलेज में. जितने अंक आये हैं, उस आधार पर दाखिला आसानी से मिल जाएगा. हमारा गांव यूपी और बिहार के बॉर्डर पर है. यहां के लोग हाट-बाजार से लेकर पढ़ाई-लिखाई के लिए बिहार ही जाते थे. बिहार के शहर छपरा, आरा, मुजफ्फरपुर वगैरह. कारण, नदी पार करते ही बिहार के ये शहर सबसे पास थे.

तब तक बिहार में पढ़ाई और परीक्षा खुलकर नकल की भी शुरुआत हो चुकी थी. परीक्षा परिणामों में अध्यापकों के जातीय गुट परीक्षा परिणामों को अपने-अपने हित के अनुसार प्रभावित भी करने लगे थे. बिहार की शिक्षा पद्धति को लेकर सवाल उठने लगे थे. इन्हीं परिस्थितियों में शिक्षकों की राय से यूपी कॉलेज जाने का निर्णय हुआ. यूपी कॉलेज जाने के बाद वहां के शिक्षकों और सीनियर छात्रों से कॉलेज के संस्थापक राजर्षि के बारे में पता चला. स्व हित से उठकर दूसरों के हित और भविष्य के बारे में सोचनेवाले राजर्षि उदय प्रताप सिंह के त्याग, समर्पण और सरोकार के बारे में जानकर किशोर मन पर ही गहरा असर हुआ. वह भिनगा के नरेश थे. उनके इकलौते लड़का थे. आकस्मिक निधन हुआ. स्वाभाविक है कि मन पर गहरा असर पड़ा होगा. जीवन में उथल-पुथल का दौर आया होगा. पर, संकट के इस दौर में, राजर्षि ने संतान सृजन की जगह हजारों संतानों के जीवन सृजन का संकल्प लिया. एक बेटा खोकर उन्होंने हजारों बेटों को योग्य बनाने का संकल्प लिया. दूरदर्शी और उत्कृष्ट फैसला किया. यूपी कॉलेज, उसका उत्कृष्ट नमूना है.

उदय प्रताप कालेज की स्थापना के अलावा भिनगा राज अनाथालय, कमच्छा महेन्द्रवी छात्रावास (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), दण्डीस्वामी मठ वाराणसी का निर्माण करवाने में राजर्षि की अहम भूमिका रही. ऐसे अनेक काम. सिर्फ धन नहीं बल्कि मन से बड़ा आदमी ही इस तरह का संकल्प ले सकता है. दूसरों के कल्याण को अपना कल्याण समझना. ऐसा विचार आना भर ही किसी इंसान को 'सामान्य’ से निकालकर 'महानता' की परिधि में खड़ा कर देता है. राजर्षि ने इसकी स्थापना भी की, तो सिर्फ एक शिक्षण संस्थान भर नहीं, बल्कि उस समय ही उनकी दूरदर्शिता दिखती है. उन्होंने उन्हीं दिनों प्रतिभावान बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए आक्सफोर्ड, कैंब्रिज जाने के लिए विशेष स्कॉलरशिप की शुरुआत की. राजर्षि जैसे लोग तभी जान गये थे कि आनेवाला समय ‘नॉलेज एरा’ होगा. जिसके पास ज्ञान का धन, वही सबसे धनवान और सर्वाइव कर पाएगा. 1970 के दशक में जब कॉलेज में गया, तब, कॉलेज के प्राचार्य आदरणीय श्री राजनाथ सिंह जी थे. इंटर कॉलेज के प्रभारी प्राचार्य थे, श्री परमानंद सिंह जी. हर समाज,समुदाय के लोग यहां रहते थे, पढ़ते थे.


इस कॉलेज में आकर बहुत कुछ सीखा. जीवन में अनुशासन, स्वअनुशासन का पाठ पढ़ा. किसी से पढ़कर नहीं, बल्कि कॉलेज की दिनचर्या, यहां के माहौल और शिक्षकों के व्यवहार से यह सीखा, समझा. शिक्षा के साथ ही व्यावहारिक जीवन की सीख. यहां हॉस्टल में रहते हुए अजनबियों से भी आत्मीय रिश्ता बनाने का गुण सीखा. समूह में रहने की संस्कृति की बुनियाद पड़ी. स्वावलंबन की भावना का विकास हुआ.

कॉलेज के छात्रावास के एक कमरे में हम चार लोग रहते थे. एक परिवार की तरह. एक-दूसरे की मदद करना. साथ रहना. जरूरत में काम आना. यह पहला मौका था, जब गांव से निकलने के बाद रहने का तरीका, अजनबियों से भी आत्मीय रिश्ता बनाने का गुण सीख रहा था. समूह में रहने की संस्कृति का विकास हो रहा था. इसी कॉलेज में अनुशासन या कहें कि स्व-अनुशासन की नींव पड़ी. हम सब सुबह चार बजे जग जाते थे. उसके बाद पीटी होता था. फिर तैयार होकर समय से कक्षा में जाना. शाम में लौटकर खेलना. तैराकी, घुड़सवारी की भी सुविधा थी. संध्या भी होती थी. बड़ी लाइब्रेरी थी. खेलने के बाद संध्या और उसके बाद सिर्फ पढ़ाई. सुबह जगकर अपना बेड सही करना. समय से नहाना, धोना. समय होने पर अपना बर्तन लेकर मेस में जाना. पंक्ति में बैठकर खाना खाना. समूह में ही. यहां गायें भी रखी गयी थीं. बच्चों को दूध भी मिलता था. यह सब स्वअनुशासन का भाव भर रहा था. हमारे समय के विद्यार्थी इस अनुशासन का स्वयं पालन भी करते थे.

उन दिनों कभी भी कॉलेज के प्राचार्य और उनकी पत्नी औचक किसी छात्रावास में पहुंचते और देखते कि बच्चे पढ़ रहे हैं या नहीं. बच्चों को कोई असुविधा तो नहीं है न! बच्चे कमरा को साफ रखते हैं या नहीं. तब, हमारे वार्डन थे, श्री प्रकाश सिंह जी. इतिहास के अध्यापक. उनका भी स्नेह उसी तरह. प्राचार्य से लेकर शिक्षकों तक का स्नेह, आत्मीयता बच्चों को गढ़ रहा था. घर से दूर होने पर अभिभावकत्व के भाव के साथ. देख-रेख करते. अस्वस्थ होने पर उचित देखभाल करते. तब, शिक्षा कारोबार नहीं था. उसका मकसद था, बेहतर नागरिक और ज्ञानवान इंसान तैयार करना.

इसी कॉलेज में पढ़ते हुए पहली बार केरल के एक क्रिश्चियन सहपाठी के साथ चर्च जाना हुआ. वहां विद्यार्थी और फादर रहते थे. वहां की सफाई, अनुशासन और तब की सादगी ने प्रभावित किया. ईसा मसीह के बारे में जानने की रुचि पैदा हुई.

उन दिनों हर साल कॉलेज में वार्षिकोत्सव होता था. पठन-पाठन, खेल-कूद, संगीत आदि की प्रतियोगिता होती थी. चुने छात्र इस वार्षिक आयोजन में पुरस्कृत होते थे. हमारे दौर का वार्षिक आयोजन हमारी स्मृति में है. जब पढ़ रहा था तो पढ़ाई में बेहतर किया तो मुझे भी इस वार्षिक आयोजन में सम्मानित होने का मौका मिला. तब, उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री आदरणीय कमलापति त्रिपाठी जी थे. वह अतिथि बनकर आये. उनके हाथों सम्मान मिला. (इस पोस्ट के साथ वही तस्वीर लगी हुई है). उस उम्र में यह उत्साहित करनेवाला प्रसंग था. पढ़ाई के दौरान, एनसीसी (नेशनल कैडेट कोर) से जुड़ना हुआ. पढ़ाई के साथ-साथ एनसीसी में भी रुचि जगी. एनसीसी परेड में भी हमारी उपस्थिति लगभग नब्बे प्रतिशत से अधिक ही रही. एनसीसी कैडेट के रूप में ही हमारा चयन उत्तर प्रदेश से चुने गये कुल 12 विद्यार्थियों के साथ हुआ, जिन्हें तब ऑल इंडिया एनसीसी कैडेट प्रशिक्षण समारोह के लिए बेंगलुरू जाने का मौका मिला. जीवन में पहली बार बड़ी लाइन की यात्रा. तीन-चार दिनों तक रूक-रूक कर यात्रा. पहले इलाहाबाद. फिर इटारसी. फिर नागपुर. फिर चेन्नई. तब वहां से वृंदावन एक्सप्रेस से बेंगलुरू. जीवन में पहला बड़ा शहर चेन्नई देखा. समुद्र देखा. एनसीसी की इस यात्रा में देश भर के बच्चे थे. अलग-अलग समुदाय के. अलग-अलग भाषाभाषी. भारत की विविधता के साथ समरस होने का पहला मौका मिला.

एनसीसी कैंप के अनुशासन से बहुत कुछ सीखा. समय से जगना. फिर परेड के लिए तैयार होना. ​फिल्ड सर्विस में जाने और फायरिंग में भी भाग लेने का मौका मिला. पंक्तिबद्ध होकर कहीं भी चलना. पंक्तिबद्ध होकर ही खाना के लिए जाना. बाद में इसका अहसास हुआ. जीवन में उसका असर पड़ा. लगा कि दुनिया के कई देश अपने यहां के सभी नागरिकों को जीवन के आरंभिक दिनों में सेना जैसा प्रशिक्षण क्यों देते हैं? इससे अनुशासन आता है. अपनी जिम्मेवारी का अहसास होता है. देश के प्रति प्रेम और समर्पण की बुनियाद पड़ती है.

उन्हीं दिनों प्रशिक्षण के दौरान एक दिन का अवकाश मिला. हम साथी बेंगलुरू के एमजी रोड गये. यादगार स्मृति के लिए वहां हमने गांधी जी पर कृपलानी जी की एक पुस्तक खरीदी. गांधी जी के आर्थिक विचारों पर. भारत सरकार के प्रकाशन संस्थान द्वारा प्रकाशित. वहां तब स्कूटर चलाती महिलाओं को पहली बार देखा. यह गांव और बनारस से गये लगभग एक किशोर छात्र के लिए एक राज्य की प्रगति का संकेत था. बाद में समझा. जिन राज्यों ने महिलाओं को समानता का अधिकार पहले दिया, उन राज्य ने तेजी से प्रगति की. विकास के पैमाने पर वे हिंदी क्षेत्र से काफी आगे निकल गये. एनसीसी से जुड़कर, एनसीसी की वजह से पहली बार दक्षिण की यात्रा का अवसर मिला. देश के अलग-अलग हिस्से के छात्रों से मिलने का अवसर मिला. सुदूर गांव से गये हमारे जैसे लोगों की समझ को विस्तार मिला. तभी लगा कि यह दुनिया कितनी बड़ी है और एक ​इंसान की हैसियत कितनी छोटी है.

यूपी कॉलेज में दो ही वर्ष गुजरे. पर, वे दो वर्ष ही जीवन में नींव डालेवाले थे. वे सुखद स्मृतियां जीवंतता के साथ मानस में है. इस कॉलेज के संस्थापक राजर्षि, तब के कॉलेज के प्राचार्य, सभी शिक्षक, वार्डन आदि का हम सबके निर्माण में अहम योगदान है. उनके इस विद्या-संस्कार ऋण के प्रति पुन: श्रद्धा के साथ उनका पावन स्मरण.

29/04/2021

एक विचार है जिसपे सबका परामर्श आवश्यक है ।

ये एक ग्रूप ही नहीं अपितु राजर्षि जी की बगिया के ढेर सारे फूलो को मिला के बना एक पुस्प गुच्छ है ।
कोविड-19 अपने चरम पर है और हर एक व्यक्ति अपनो के लिए इस कठिन घड़ी में परेशान है और इस कठिन घड़ी में बहोत सारे लोगों को मदद की ज़रूरत पड़ रही है जैसे किसी को किसी शहर में ऑक्सिजन, किसी को अस्पताल के बारे में जानना है की वहाँ बेड है की नहीं , है तो ख़ाली है की नहीं , भरे हुए ऑक्सिजन सिलेंडर कहा मिलेंगे , दवा से सम्बंधित जानकारी , ambulance सम्बन्धी जैसे तमाम जानकारीया ।
ऐसे समय में इस ग्रूप को मदद करने का एक माध्यम बनाए जाने की ज़रूरत है । जिसमें जिस किसी भी व्यक्ति को जिस शहर की जानकारी है जैसे कि भरे हुए ऑक्सिजन कहा मिलेंगे , अस्पताल में ICU Ventilater की उपलब्धता सम्बन्धी जानकारी , Ambulance की जानकारी , दवा सम्बन्धी जानकारी साझा करे जिससे की किसी की मदद की जा सके ।
कोइ भी जानकारी साझा करने से पहले कृपया उसको पुख़्ता ज़रूर कर ले , Whatsapp या Facebook के forwarded MSG कृपया साझा ना करे ।

सब सुरक्षित रहे स्वस्थ रहे यही महादेव से कामना है 🙏🏻

विशेष भृगुवंशी को ढेर सारी शुभकामनाएँ और बाबा काशी विश्वनाथ से प्रार्थना करते है की राजर्षि परिवार के खिलाड़ी को इस बार ...
07/07/2020

विशेष भृगुवंशी को ढेर सारी शुभकामनाएँ और बाबा काशी विश्वनाथ से प्रार्थना करते है की राजर्षि परिवार के खिलाड़ी को इस बार अर्जुन अवार्ड मिले ।

25/06/2020

" दृढ़ राष्ट्रभक्ति पराक्रमश्च "

एक ऐतिहासिक परिचय क्षत्रिय महासभा तदर्थनाम अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा स्थापना दिवस -----संक्षिप्त उदभव इतिहास एवं शिक्ष...
24/06/2020

एक ऐतिहासिक परिचय क्षत्रिय महासभा तदर्थनाम अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा स्थापना दिवस -----
संक्षिप्त उदभव इतिहास एवं शिक्षाविद राजा उदय प्रताप सिंह जूदेव का योगदान
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1857 के स्वतंत्रता के इतिहास का अहम् योगदान था क्षत्रिय सभा के निर्माण में ---
अंग्रेजी शासन काल में ,प्रथम स्वतंत्रता संग्राम अंग्रेजों द्वारा क्षत्रियों के विरुद्ध अपनाई गई कलुषित नीति के विरुद्ध विदेशी दासता से मुक्ति पाने के लिए एक खुली अघोषित क्रांति थी जिसका प्रमुख केंद्र बिंदु उत्तर भारत था ।शुरुआत में इसके सूत्रपात्र के दो मुख्य श्रोत "सैनिक क्रांति "और "जन क्रांति "थे ।इसके सूत्रपात्र का जिम्मा शुरुआती दौर में उत्तरप्रदेश ,बिहार ,मध्यप्रदेश ,दिल्ली ,पंजाब (वर्तमान हरियाणा )तथा आँध्रप्रदेश के उत्पीड़ित क्षत्रिय शासकों एवं मुस्लिम नबाबों ने उठाया था ।यह क्षत्रिय -मुस्लिम एकता का अदभुत संगम था ।सयुक्त प्रान्त , आगरा एवं अवध में , अवध की वेगमों ,बनारस के राजा चेत सिंह की फांसी ,रुहेलखण्ड के क्षत्रिय सरदारों के प्रति ईस्ट इंडिया कंपनी की उपेक्षा पूर्ण नीति और दिल्ली के अंतिम मुगल शासक बहादुरशाह जफ़र के दो बेटों को दिल्ली में बीच मार्ग पर खड़ा करके गोली मारने की घटना ने आग में घी डालने का काम किया ,साथ ही क्षत्रिय राजाओं को गोद लेने की प्रथा को समाप्त करने की लार्ड डलहौजी की घोषणा ने भी भीषण जनक्रांति को जन्म दिया ।
परिणामस्वरूप मुग़ल शासक बहादुरशाह जफ़र के झंडे के नेतृत्व में बेगम हजरत महल ,झांसी की रानी लक्ष्मीबाई , बाजीराव पेशवा ,अवध के राजा बेनी माधव सिंह ,उन्नाव के राव रामबक्श सिंह बैस ,बाबू कुंवर वीरसिंह पंवार जगदीशपुर ,दरियाव सिंह खागा ,राजा नरपति सिंह हरदोई ,शिवरतन सिंह हिस्था सेमरी बिहार ,गालब सिंह अलुरी ,सीताराम राजू आंध्र प्रदेश तथा रानी निड़ाल नागालैंड आदि ने क्रांति कर लाखों क्रांतिकारियों के साथ क्रांति की ज्वाला को प्रज्जवलित कर दिया ।
इसी समय गोंडा के राजा देवी बख्श सिंह बिसेन ,कालाकांकर के राजा हनुमंत सिंह ,प्रताप सिंह ,माधोसिंह ,अवध के राजा बैनी माधव सिंह ,दरियाव सिंह ,बाबूसहलन सिंह ,जोधराज सिंह खीरी आदि राजाओं ने अवध की वेगम हजरत महल के योगदान से कालाकांकर के गंगा पुलिन पर "राम दल "का 16मई 1857ई0 में गठन किया जिसका प्रतीक चिन्ह "श्री राम "के चिन्ह के साथ लाल कमल का फूल था और जिसके प्रचार तंत्र में योगी एवं साधुमहात्मा भी घर- घर जाकर क्रांति का प्रचार -प्रसार कर रहे थे ।अंग्रेजी हुकूमत में अवध के जो सरदार लगान नही देपारहे थे उनकी जमीन जप्त कर लीगयी और उनको उनके अधिकारों से वेदखल कर दिया गया ।इस कठोर नीति ने जनक्रांति को वीभत्स रूप प्रदान किया ।इसी समय अंग्रेजों के द्वारा प्रदत्त बंदूकों की गोलियों से गाय और सूअर की चरबियों के लगाने से हिन्दू और मुस्लिम सैनिकों में धार्मिक उन्माद ने क्रांति के रूप में जन्म ले लिया ।क्रांति के लिए निर्धारित तिथि 31 मई0 1857ई0 थी पर इसके पूर्व ही 26फरवरी 1857 ई0 को सैनिक छावनी बहरामपुर में विद्रोह हुआ लेकिन उसे दवा दिया गया ।31 मार्च 1857ई0 में मंगल पांडे ने विद्रोह कर दिया और विद्रोह की ज्वाला भड़क गयी ।बैसवाडा क्षेत्र उस समय ब्रिटिश फ़ौज की छावनी थी ,जहाँ 40000 हजारसे अधिक क्षत्रिय सरदार सेना में सैनिक थे ।करीव तीस हजार पेंशन पारहे थे इनको युद्ध का अनुभव था ।वे सभी राजाओं की क्रांति सेना में भर्ती होगये ।नवाब रुहेलखण्ड की सेना में पिचहत्तर हजार बैस राजपूत सैनिक ,बैस वाड़ा के राजा बेनी माधव की सेना में 35 हजार सैनिक थे ।बैस वाङा केहर परिवार से हर एक व्यक्ति उनकी सेना का अंग था ।बिहार के कुंवर वीर सिंह की सेना में 65 हजार विद्रोही सैनिक शामिल थे ।
यह एक महान क्रांति का समय था ।अंग्रेज गरीब भारतीयों को धन के लालच से ईसाई बना रहे थे ।इसी समय कुछ क्षत्रिय राजाओं और नवाबों के अत्याचारों से पीड़ित थे वे परोक्ष रूप से अंग्रेजों से मिले रहे ,जिससे उनको सामाजिक उपेक्षा का शिकार तो होना ही पड़ा ,पर इसे क्षत्रियो को लामबन्द करके इस बलि बेदी पर एक सूत्र में बाँधने की आवश्यकता का अनुभव हुआ ।कालाकांकर प्रतापगढ़ के राजा हनुमंत सिंह के नेतृत्व में गंगा -जमुना क्रांति के प्रवाह में "राम दल "नाम के संघ ने गोपनीय तरीके से क्लब के रूपमें क्षत्रिय महासभा के सूत्रपात्र को जन्म दिया और क्षत्रियों ने "राम दल " को विघटित कर उसके स्थान पर 1860 ई0 में "क्षत्रिय हितकारणी सभा का गठन किया पर यह राजाओं ,राजदरवारियों और उनके सहयोगियों का संगठन आम बन कर रह गया जिसका कार्य क्षेत्र उत्तरप्रदेश (प्रतापगढ़ ,गोरखपुर ,आजमगढ़ ,बलिया ,रायबरेली ,उन्नाव ,आगरा ,मथुरा ,हरदोई ,मैनपुरी ,गोंडा ),मध्यप्रदेश ,राजस्थान ,गुजरात ,बंगाल ,जम्बू कश्मीर ,पंजाब (वर्तमान हरियाणा )तक ही सीमित था जिसके सरपरस्त अंग्रेजों के शुभचिंतक थे इस कारण इससे क्रांति कारियों के परिवारों ने प्रायः दूरी बना कर रखी गई ।कालाकांकर जन्मी क्षत्रिय हितकारणी सभा ने कालान्तर में आगरा और अवध के नाम को परिवर्तित कर संयुक्त प्रान्त आगरा और अवध के नाम से पंजीकृत किया ।
अवागढ़ ,एटा के राजा बलवंत सिंह के नेतृत्व में तत्काल समिति के प्रतिनिधि ठाकुर उमराव सिंह कोटला , राजर्षि राजा उदयप्रताप सिंह जू देव ,राजा खडग बहादुर सिंह ,मझोली ,बिहार ,श्री रामदीन सिंह ,तथा राजा मल्ल एवं अन्य क्षत्रियों ने "क्षत्रिय हितकारणी सभा "को बदल कर इसका पुनः नामकरण "क्षत्रिय महासभा "रखा गया ।
इसी समय में संयुक्त प्रान्त आगरा और अवध के प्रदेश 19 अक्टूबर 1897 ई0 में भारतीय सोसाइटी अधिनियम के तहत राजधानी लखनऊ (लक्ष्मणपुर )अवध में सभा का पंजीकरण हुआ ।राजा बलवंत सिंह ,अवागढ़ ,एटा को संयुक्त प्रान्त आगरा एवं अवध को जनक (Founder )के रूप में अध्यक्ष निर्वाचित कर इसका पंजीकरण पंजीकृत कार्यालय 224 महात्मा गांधी मार्ग ,लखनऊ कैंट ,उत्तरप्रदेश तथा प्रधान कार्यालय मथुरा ,संयुक्त प्रान्त आगरा एवं अवध में रखा गया ।
कालान्तर में 09 -11 -1986ई0 में महाराजा लक्ष्मण सिंह डूंगरपुर के अध्यक्ष एवं श्री कोक सिंह भदौरिया ,राष्ट्रीय महामंत्री के समय में "क्षत्रिय महासभा " यह सभा भारत में "अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा "के रूप में सम्बोधित होगी ,के नाम से पुनरावृत्ति की गयी ।

तुम हमको यूँ ही भुला न पाओगे

देश जब अंग्रेजों की गुलामी की जंजीर में जकड़ा हुआ था उस समय आम राजपूत की आर्थिक एवं शैक्षनिक स्थित बहुत ही दयनीय थी । एक तरफ सामाजिक संगठन का आभाव व् दूसरी तरफ अशिक्षा ने समाज की उन्नति को खोखला कर रखा था । अधिकांश बड़े बड़े राजा व् महाराजा अंग्रेजों के कठपुतली बन चुके थे ।सामाजिक चेतना की जागृति करने का तो किसी ने सोचा भी नही था ।जादातर राजवाड़े अपनी सुख -सुविधाओं को बनाये रखने के लिए ही अंग्रेजों के आधीन थे ।उन्हें समाज के उत्थान से कोई लेना -देना भी नही था । देशके कुछ गिने -चुने छोटे राजाओं और जागीरदारों के मन में यह विचार आया कि क्षत्रिय समाज का कैसे उत्थान सम्भव है क्यों कि परिस्थितियां उस समय बहुत प्रतिकूल थी । कुछ जागीरदार एवं शिक्षित राजपूतो ने विचार कर समाज के शैक्षणिक विकास व् सामाजिक उत्थान के लिए संगठन बनाने का मंथन और चिंतन किया जिसमें राजा बलवंत सिंह अवागढ़ ,राजर्षि राजा उदयप्रताप सिंह जू देव ,ठाकुर उमराव सिंह ,राजा प्रताप सिंह जी जम्बू कश्मीर ने प्रचार प्रसार करके क्षत्रियों में शिक्षा व् सामाजिक उत्थान के लिए जागृति के लिए अभियान चलाया ।
ये हमारे लिए बड़े हर्ष एवँ स्वाभिमान का विषय है क़ि ये उन तीनों महापुरुषो के द्वारा बनाया गया क्षत्रियों का संगठन " क्षत्रिय महासभा" तदर्थ नाम "अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा " आज इतना बड़ा बट वृक्ष का रूप ले चुका है कि देश के सभी प्रान्तों के जिलों में विद्यमान है और राजपूत हितों के लिए कार्य कर रहा है ।कितनी उच्च कोटि की सोच थी ये राजपूत समाज के विकास के लिए उन महान व्यकित्व की ।केवल सोच ही नही थी इन तीनो राजपूत राजाओं ने समाज के सामाजिक विकास के अलावा शैक्षणिक विकास के लियेअपना महान योगदान भी दिया जिस आज हमारा समाज राजा बलवंत सिंह महाविद्यालय आगराऔर उदयप्रताप कॉलेज वनारस के रूप में देखते भी है और उसका हमने लाभ भी लिया जिसके लिए हम उनके हमेशा ऋणी भी रहेंगे। अधिकांश देश के पुराने शिक्षित राजपूत इन्हीं दोनों कॉलेज के पढे हुये है ।इन महाविद्यालयों का राजपूतों के शैक्षणिक विकास में आज भी बहुत बड़ा योगदान है और हर राजपूत विद्यार्थी बड़े गर्व से फक्र महसूस करते हुए कहता है कि मैं बलवंत राजपूत कॉलेज आगरा या राजा बलवंत सिंह कॉलेज आगरा और उदय प्रताप कॉलेज वनारस का शिक्षित व् संस्कारी क्षात्र हूँ ।
आज हमारे समाज में केवल ये ही सोच है कि "मैं और मेरा परिवार "।
अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा की प्रथम सभा आगरा में ठाकुर उमराव सिंह जी और उनके छोटे भाई नौ निहाल सिंह जी की कोठी "बाघ फरजाना "जिसको बाद में राजपूत बोर्डिंग हाउस का नाम दिया गया उसमें संपन्न हुई थी ।
20जनवरी 1898को राजा बलवंत सिंह जी और उनके दोनों सहयोगी राजा उदय प्रताप सिंह जी भिनगा और कोटिला के राजा उमराव सिंह ने बनारस के बाबू सांवल सिंह जी की अध्यक्षता में प्रस्ताव पारित करके क्षत्रिय समाज में एकता और जागृती लाने के उदेश्य से एक समाचार पत्र जिसका नाम "राजपूत मासिक "दिया गया प्रकाशित कर वाया गया जिसके माध्यम से देश के विभिन्न भागों में फैले हुए समस्त क्षत्रिय समाज में उनकी सामाजिक ,शैक्षणिक विकास एवं समस्याओं के निराकरण के जनसम्पर्क और नुक्कड़ सभाएं शुरू हुई थी । राजर्षि उदय प्रताप सिंह का योगदान इन कार्यक्रमों में बहुत था क्योंकि वे उच्च शिक्षित जहीन व्यक्ति थे। राजर्षि को भविष्य के बारे में पता था उनकी दृष्टि दिव्य थी।

Contribution of Raja Udai Pratap Singh Ji of Bhinga in Educational Development of Rajput Community.

राजा उदय प्रताप सिंह जी भिंगा राजपरिवार का भी राजपूतों के सामाजिक विकास के अतरिक्त शैक्षणिक विकास मेंभी महत्वपूर्ण व् सराहनीय योगदान रहा था ।वे स्वयं भी बहुत शिक्षित थे ।राजपूतों के शैक्षणिक विकास में उनके योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा ।उन्होंने वाराणसी में सन् 1909 में हेवेत्त क्षत्रिय हाई स्कूल की स्थापना की जिसके लिए 100000 0रूपये दान दिए जो 1921 में इंटरमीडिएट कॉलेज में अपग्रेड हुआ जो बाद मेंउदय प्रताप इंटरमीडिएट कॉलेज के नाम से जाना गया ।बाद में 1949में डिग्री कॉलेज में अपग्रेड हुआ और जिसका नाम उदय प्रताप कॉलेज हुआ । बाद मे यह कालेज चन्द्रशेखर जी के प्रधानमंत्री काल मे स्वायत्तशासी हो गया । उदय प्रताप कॉलेज को स्वायत्तशासी करने की घोषणा प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी ने किया था ।उदय प्रताप कॉलेज को स्वायत्तशासी करने की घोषणा स्वयं तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी ने कालेज परिसर से किया था। राजा उदय प्रताप सिंह जी ने क्षत्रिय उपकर्णी महासभा की स्थापना की जिसके लिए भिनगा राज क्षत्रियों के लिए 35000रूपये दान दिए ।इसके अलावा वे हर साल क्षत्रिय ग्रेजुएट को ऑक्सफ़ोर्ड और कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में शिक्षा पाने के लिए11000रूपये क्षात्रवृति के रूप में देते थे ।
राजर्षि स्वर्गीय पंडित मदन मोहन मालवीय जी की विचाधारा के अनुयायी थे ।उन्होंने उदय प्रताप कॉलेज के आलावा कई दूसरी संस्थाओं को आर्थिक सहायता प्रदान की ।राजा साहिब ने वाराणसी के कमच्छा में उर्फन्स होम ,भिनगा राज अनाथालय एस्टेब्लिशद किये जिसके लिए 123000रूपये खर्चे के लिए दान दिए ।उन्होंने लाखों रूपये दूसरे सामाजिक संगठनो को दान दिए जिनमें के0 जी0 मेडिकल कॉलेज लखनऊ ,कैल्विन तालुकुदार कॉलेज लखनऊ ,मूलघंध कुतिविहार ,सारनाथ ,हिंदी प्रचारिणी सभा सम्लित है ।उन्होंने राजपूत छात्रों के लिए कई छात्रवृति के रूप में फण्ड दिए जिसके लिए वे हमेशा याद किये जाएंगे ।
सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह है क्षत्रिय महासभा के गठन ,कालेजों की स्थापना , रुप रचना इत्यदि का कार्य राजर्षि उदय प्रताप सिंह जू देव ने ही किमा था । इन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले राजा बलवंत सिह , जिन्होने RBS College आगरा की स्थापना किया था ,स्वयं बहुत पड़े लिखे नही थे । राजा बतवंत र्सिह को इस बात की टीस आजीवन रही । राजा उमराव सिंह भी सामान्य शिक्षित थे , परन्तु राजषि उदय प्रताप सिंह जू देव उच्च शिक्षित घे। इन तीनों महापुरुषों का योगदान शिक्षा के क्षेत्र में समाज सेवा के क्षेत्र में सदैव अग्रणी रहेगा। दुर्भाग्य है इतिहासकारों ने इन महान शिक्षाविदों के प्रति न्याय नहीं किया। मेरी दृष्टि में इतिहासकारों ने उन तमाम राजाओं के प्रति न्याय नहीं किया जिन्होंने अपना खजाना खोल के समाज के उत्थान के लिए शिक्षा के प्रसार और प्रचार के लिए सैकड़ों कालेजों की स्थापना किया था। भारतवर्ष में राजाओं और महाराजाओं द्वारा खोले गए कालेजों के पीछे राजर्षि उदय प्रताप सिंह जूदेव की प्रेरणा थी। धार्मिक नगरी काशी में भारतवर्ष के सभी राजाओं महाराजाओं का आना जाना था। राजर्षि उदय प्रताप सिंह जूदेव ऐसे प्रेरणा पुंज के रूप में उभरे जिनकी प्रेरणा को प्राप्त करके शिक्षा दान का महा अभियान चल पड़ा ।
ऐसे पुंज कभी अस्त नही होते सदैव प्रकाश देते रहते है । अमरत्व प्राप्त राजर्षि वह आकाश दीप है जो सदैव आपके हमारे रुप मे रोशनी विखेरते रहेगें।
त्रिभुवन प्रताप सिंह

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21/06/2020

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